हलधर किसान इंदौर। कपास सफेद सोना है और भारत की मुख्य नकदी फसल है। वर्ष 2001 में हरी सुन्डी (American Bollworm Helicoverpa Armigera) के द्वारा फसल पूरी तरह नष्ट कर दी तथा कीटनाशी रसायनों की प्रभावी क्षमता शून्य हो गई। हरी सुन्डी के अलावा गुलाबी सुन्डी (Pink bollworm Pectinophora Gossypiella)) तथा चित्तीदार सुन्डी (Spotted Bollworm Earias Vittella) इन सभी कीटों का इतना भयंकर प्रभव पड़ा कि कपास उत्पादन काफी गिर गया अतः भारत सरकार ने जैविक Biologocial Insicticides Baccilus Thuringiensis का प्रयोग करने की अनुमति दी।
1. अनुमति :-
कपास के कीटों में सबसे मुख्य हरी सुन्डी सबसे खतरनाक एवं नुकसान पहुंचाने वाली सुन्डी है। कीटनाशियों के प्रति इसकी व्यापक प्रतिरोधक क्षमता, साल में एक से ज्यादा पीढ़ियों का उत्पादन, बहुतायत में प्रजनन तथा Polphagous विविध प्रकार के पौधों को अपना भरण-पोषण एवं आश्रय का आधार बनाने के कारणों से परेशान होने पर सरकार ने बी.टी. कॉटन अपना कर राहत की सांस ली। हरी सुन्डी के साथ 2 लैप्टोपडेरा वर्ग के अन्य कीट जैसे गुलाबी सुन्डी, चितीदार सुन्डी के नियन्त्रण हेतु (Bt. Cotton) के उपयोग की अनुमति दी। इन तीनों सुन्डियों की रोकथाम के लिए Cry-1 AC जिसको महीको मोनसैटो कम्पनी ने व्यवसायिक नाम BOLL GARD-I दिया एक और लंगड़ी सुन्डी (Semilooper Bollworm) के लिये Cry 2 AB जीन की सिफारिश की जिसे मोनसैन्टो महिको कम्पनी ने बोलगार्ड-II (Boll Gard-II) नाम दिया।
2. कीट रोधक क्षमता क्षीण :-
Bt Cotton के उगाने से आशातीत उत्पादन वुद्धि हुई वर्ष 2001 में कपास का उत्पादन 160 लाख गाँठें था जो अब बढ़कर 320 लाख गाँठें हो रहा है और यह चमत्कार Bt. Cotton के उपयोग से हुआ क्योंकि सभी बी.टी. कपास की किस्में संकर किस्में हैं और साधारण किस्मों की अपेक्षा अधिक उत्पादन होता है साथ ही कीटों के कारण हुई हानि बचत या प्रति एकड़ उत्पादन के रूप में मानी जाती है। कुछ समय से अनुभव किया जा रहा है कि बी.टी. जीन युक्त, या परिवर्तित Modified या अनुवांशिक अभियान्त्रित Genetically Engineered किस्मों में गुलाबी सुन्डी में कीट रोधक क्षमता घट रही है और यह 80 प्रतिशत तक क्षति पहुँचा रही है। पिछले वर्षों में राजस्थान के विभिन्न भागों में और विशेषतया श्री गंगानगर जिले में पिंक वाल वार्म का भयंकर प्रकोप हुआ और विक्रेता-कृषक सम्बन्ध दरकने लगे और अनावश्यक रूप से उपभोक्ता न्यायालयों में प्रकरण बढ़े।
किसानों ने बीज विक्रेताओं की दुकानों धरने दिए तथा उनका मानसिक त्रास (Mental agony) दी। ऐसी कष्टकारक परिस्थितियों में बी.टी. कपास उत्पादक कम्पनियाँ, बी.टी. जीन डालने वाले ब्रीडर, कृषि विभाग के अधिकारी जो प्रति वर्ष Bt. बेचने की अनुमति देते हैं सामने नहीं आए। कोई सार्वजनिक घोषणा भी इस बारे नहीं की और लाखों-करोडों का लाभ लेने वाली कम्पनियाँ सीड डीलर को किसानों द्वारा शोषण, दोहन के लिये छोड़ दिया जो चन्द रुपयों के कमीशन के लिए कार्य करते हैं।
3. जी.ई.ए.सी. द्वारा अनुमति :-
बी.टी. कपास की किस्म G.E.A.C. समिति की गहन पड़ताल करने के बाद जारी की जाती है उनमें कीड़ों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता के टैस्ट किये जाते हैं।
4. प्रति वर्ष राज्यवार परिक्षण :-
बिजाई वर्ष से एक साल पूर्व कम्पनियों द्वारा जारी किस्मों की हर राज्य के कृषि विश्वविद्यालयों में परिक्षण किया जाता है और गुणवत्ता तथा रोग कीट रोधी किस्मों की कृषि महानिदेशकों द्वारा सिफारिश की जाती है अतः बीज विक्रेताओं को गुलाबी सुन्डी के प्रति दोषी समझना गलत / असंगत है।
कपास के लिये भारत सरकार द्वारा बनाए गये प्रमाणीकरण मानकों में कीट क्षति और रोग के भारतीय न्यूनतम बीज लिए कोई मानक नहीं अतः कपास की सभी बी.टी. किस्मों का स्वयं प्रमाणित बीज उत्पादन करते समय मानकों में कोई Standard न होने के कारण उनके उलंघन Violation के लिये उत्पादक उत्तरदायी नहीं है।
एडवायजरी
हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार ने खरीफ 2024 में एक एडवाईजरी जारी की है जिसमें लिखा है कि “वर्तमान में गुलाबी सुन्डी के प्रति बी.टी. कपास का प्रतिरोधक बीज उपलब्ध नहीं है” अर्थात किसान को अच्छा उत्पादन लेने हेतु हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय की सलाह मान कर कार्य करना चाहिए और बीज विक्रेताओं या बीज उत्पादक कम्पनियों को गुलाबी सुन्डी के कारण हुई क्षति के लिये जिम्मेदार न माना जाए।
‘समय रहते यदि कृषि रोग मुक्त नहीं होगी। तो समझ लो कयामत से पहले कयामत होगी।”
कड़वा है पर सच है*
श्रीकृष्णा दुबे जी की प्रतिक्रिया- साथियों, यह बात तो समझ में आती है की मध्य प्रदेश में जो बीज उत्पादक बड़ी-बड़ी कंपनियां है। नेशनल व इंटरनेशनल उनके द्वारा उत्पादित कपास बीज अपने वितरक विक्रेताओं के द्वारा किसान भाइयों को दिया जाता है । आश्चर्य की बात तो यह है की इन कंपनियों के द्वारा जो बीटी कपास सही है, जिसकी परमिशन सरकार से विभाग से ली गई है। वह जितना मध्य प्रदेश में कपास का बीज लगता है उसका 40% मात्रा भी नहीं होती है । और 60 प्रतिशत से ज्यादा बीटी कॉटन जिसको हम अवैध बोलेंगे वह बीज 4G व 5G के नाम से गुजरात से अवैध तरीके से लाया जाता है। और अवैध तरीके से उसकी बिक्री भी होती है ।
आश्चर्य की बात है की मध्य प्रदेश का कृषि विभाग अभी तक ये अवैध रूप से लाकर विक्रय करने वाले कपास बीज के जो फर्जी जाली अवैध विक्रेता है, उनको अभी तक पकड़ नहीं पाई है। *पिछले कई सालों से यह अवैध व्यापार कपास बीज का मध्य प्रदेश के उन जिलों में हो रहा है। जहां पर कपास की खेती होती है। सरकार को इस तरफ विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए। यह जो कंपनियां है अपनी देश की और मल्टीनेशनल कंपनियां इन सभी ने मिलकर भी सरकार के सामने यह अवैध कपास बीज के व्यापार की बात रखना चाहिए। क्योंकि भविष्य में इस प्रकार के अवैध कपास बीज बीटी कॉटन में अगर किसी प्रकार का बड़ा रोग लगता है, कोई बड़ी बीमारी होती है जिससे कि *किसान भाइयों का बड़ा नुकसान हो जाएगा, उसका जिम्मेदार कौन रहेगा? विभाग और सरकार जब जागेगी, जब कोई किसानों का बड़ा नुकसान होगा । हम मध्य प्रदेश कृषि आदान विक्रेता संघ भोपाल के अध्यक्ष मान सिंह राजपूत, राष्ट्रीय प्रवक्ता व सचिव संजय रघुवंशी प्रदेश उपाध्यक्ष श्री कृष्णा दुबे और अन्य पदाधिकारी ने विभाग से सरकार से यह मांग की है कि इस प्रकार के प्रदेश में अवैध बीटी कपास के व्यापार को रोका जाए। समय रहते यदि ध्यान नहीं दिया गया तो कपास का बीज लगाने वाले किसानों का बहुत बड़ा नुकसान होने की संभावना है।

आर.बी. सिंह, बीज कानून रत्न, एरिया मैनेजर (सेवानिवृत) नेशनल सीड्स कारपोरेशन लि० (भारत सरकार का संस्थान) सम्प्रति ‘कला निकेतन”, ई-70, विधिका-11, जवाहर नगर, हिसार-125001 (हरियाणा), दूरभाष सम्पर्क-79883-04770, 94667-46625 (WhatsApp)
