प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने बालाघाट में प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन

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कलेक्टर श्री मीना ने कहा – जैविक उत्पादों की मार्केटिंग पर विशेष ध्यान दें

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हलधर किसान बालाघाट। जिले में प्राकृतिक एवं जैविक खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग के तहत 30 जुलाई को कलेक्ट्रेट कार्यालय में एक महत्वपूर्ण प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में कलेक्टर श्री मृणाल मीना ने कहा कि बालाघाट जिले में जैविक खेती की असीम संभावनाएं हैं, विशेषकर बैहर, बिरसा, परसवाड़ा और लांजी जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्रों में। उन्होंने कहा कि जैविक उत्पादों की सुनियोजित मार्केटिंग किसानों की आय बढ़ाने और स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा करने में सहायक सिद्ध हो सकती है।

Training workshop organized in Balaghat to promote natural farming

कार्यशाला में जिला पंचायत के सीईओ श्री अभिषेक सराफ, उप संचालक कृषि श्री फूलसिंह मालवीय, सहायक संचालक श्री राजेश खोबरागढ़े, उद्यानिकी अधिकारी श्री क्षितिज कराड़े, कृषि वैज्ञानिक डॉ. सीताराम धुवारे तथा कृषि महाविद्यालय मुरझड़ के प्रशिक्षण अधिकारी उपस्थित रहे।

इस अवसर पर कृषि सखी दीदी, कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन और आत्मा परियोजना के स्टाफ को प्राकृतिक खेती, जैविक खाद, दवाओं एवं अन्य जैविक उत्पादों के निर्माण व उपयोग पर विस्तार से जानकारी दी गई।

कलेक्टर श्री मीना ने निर्देश दिए कि—

  • जिले में 10,000 कृषि सखी दीदियों का गठन किया जाए।
  • 100 से अधिक रिसोर्स पर्सन तैयार किए जाएं।
  • जैविक खाद और दवाओं का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए।
  • मिलेट्स (मक्‍का, कोदो, रागी) के जैविक उत्पादन को प्रोत्साहन मिले।
  • फल-सब्जियों की प्रोसेसिंग की व्यवस्था जिले में ही हो।

कार्यशाला में उप संचालक कृषि श्री मालवीय ने बताया कि जिले में 50 क्लस्टर बनाए जा चुके हैं, जिनमें 5105 किसानों का चयन और 3692 किसानों का पंजीयन पूरा किया गया है। प्रत्येक क्लस्टर से 625 किसानों और 02 कृषि सखी दीदियों का चयन किया जा रहा है।

कृषि सखी दीदी वे महिलाएं हैं जिनके पास कम से कम एक एकड़ भूमि है और वे स्वयं जैविक खेती कर रही हैं। वहीं कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन वे महिलाएं हैं जिनके पास कम से कम 10 गायें हैं और जो जीवामृत, घनजीवामृत, नीमास्त्र जैसे जैविक उत्पाद बना रही हैं।

यह प्रशिक्षण कार्यशाला न केवल प्राकृतिक खेती को मजबूती देने की दिशा में एक सार्थक प्रयास है, बल्कि स्वस्थ खाद्य प्रणाली और टिकाऊ कृषि के निर्माण में भी एक महत्वपूर्ण पहल है।

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