हलधर किसान नई दिल्ली। वैज्ञानिकों ने ऐतिहासिक खोज म मूंगफली की खेती को बर्बादी से बचाने की दिशा में बड़ी सफलता हासिल की है। इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर द सेमी.एरिड ट्रॉपिक्स और उसके साझेदार संस्थानों ने स्टेम रॉट (तना सडऩ) रोग के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता से जुड़े 13 जीनोमिक क्षेत्रों और 145 संभावित जीनों की पहचान की है।
स्टेम रॉट बीमारी, जो स्क्लेरोटियम रोल्फ्साई नामक मिट्टी में पनपने वाले फफूंदी जनित रोगाणु के कारण होती है, मूंगफली की खेती के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है। इस बीमारी से न केवल उत्पादन में भारी गिरावट आती है, बल्कि किसानों को भारी आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है।
वैज्ञानिकों ने तीन प्रमुख प्रतिरोधक जीन एएचएसआर 001, एएचएसआर002 और एएचएसआर 003 की पहचान की है, जो अकेले ही 60 प्रतिशत तक रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करते हैं। ये निष्कर्ष द प्लांट जिनम नामक प्रतिष्ठित शोध पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं।
आईक्रिसैट के प्रमुख वैज्ञानिक मनीष पांडे के अनुसार इन जीन मार्करों की मदद से अब हम तेजी से ऐसी मूंगफली किस्में विकसित कर सकते हैं, जो न केवल सस्ती होंगी बल्कि जलवायु परिवर्तन और बीमारियों के प्रति अधिक सहनशील भी होंगी।
एक आईक्रिसैट अधिकारी ने कहा, फंगीसाइड्स महंगे और आंशिक रूप से प्रभावी होते हैं, साथ ही पर्यावरण के लिए भी नुकसानदायक। जबकि जीनोमिक्स.आधारित ब्रीडिंग एक टिकाऊ और किफायती समाधान प्रदान करती है।
यह खोज न केवल किसानों के लिए जोखिम कम करेगी, बल्कि वैश्विक खाद्य और पोषण सुरक्षा को भी मजबूत बनाएगी। मूंगफली एक प्रमुख तिलहन और प्रोटीनयुक्त दलहन फसल है, जिसकी खेती 3 करोड़ हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में होती है और सालाना वैश्विक उत्पादन 5 करोड़ टन तक पहुंचता है। भारत, नाइजीरिया और चीन जैसे देश, मूंगफली उत्पादन में अग्रणी हैं और इसका उपयोग भोजन, आय और व्यापार के मुख्य स्रोत के रूप में करते हैं। सीआईआरआईएसएटी के महानिदेशक हिमांशु पाठक ने कहा यह उपलब्धि दर्शाती है कि कैसे कृषि अनुसंधान आर्थिक विकास को गति देता है और वैज्ञानिक खोजों को व्यवहारिक समाधान में बदलता है।
वैज्ञानिकों ने किया कमाल, मुंगफली में तना रोग से बचाएगा नया शोध
