चीन.यूरोप में खाद्य सुरक्षा पर मंडराया संकट

Food security in danger in China and Europe

मौसम की मार से कहीं गर्मी से झुलस रहे खेत, तो कहीं बाढ़ से डूब रही फसलें,

हलधर किसान नई दिल्ली। पर्यावरण असंतुलन तेजी से मानव जन- जीवन पर प्रभाव डाल रहा है। इसका ताजा उदाहरण चीन से लेकर यूरोप तक देखा जा सकता है, जहां इस समय मौसम का मिजाज बेकाबू है। कहीं लू की लपटें फसलों को झुलसा रही हैं, तो कहीं मूसलाधार बारिश खेतों में लगी फसलों को बहा ले जा रही है। इस असमान्य और मौसम के कहर के चलते किसानों की चिंता बढ़ गई है और खाद्य सुरक्षा पर वैश्विक स्तर पर खतरा मंडराने लगा है।  
 पूर्वी और मध्य चीन के कृषि प्रधान क्षेत्रों जैसे अनहुई, झेजियांग, हुबेई और हेनान में तापमान 40 डिसे से ऊपर जा पहुंचा है। यह तापमान सामान्य औसत से कई डिग्री अधिक है। सान सीजन  जो भारत के नौतपा की तरह होता है, इस बार असामान्य रूप से जल्दी शुरू हो गया है, जिससे मिट्टी की नमी तेजी से खत्म हो रही है और सिंचाई सिस्टम पर दबाव बढ़ गया है।
इसके चलते खेतों में दरारें, बिजली की रिकॉर्ड खपत, और जलविद्युत पर निर्भर सिचुआन जैसे प्रांत संकट में हैं। वहीं दूसरी तरफ चेंगदू और अन्य दक्षिणी इलाकों में अत्यधिक बारिश हो रही है, जिससे अचानक बाढ़ आ रही है और फसलें जलमग्न हो रही हैं।

 संकट में फसलें

यूरोप की बात करें तो यहां नीदरलैंड, जर्मनी और बेल्जियम में अप्रैल से ही बारिश नहीं के बराबर हुई है। जर्मनी के सैक्सोनी.एनहाल्ट क्षेत्र में किसानों को 30 प्रतिशत तक फसल नुकसान का डर सता रहा है। यूरोपीय सूखा वेधशालाके अनुसार यहां 30 प्रतिशत भूभाग ऑरेंज अलर्ट पर है। कई क्षेत्र रेड अलर्ट जोन में डाले गए हैं। आलम ये है कि पशुपालकों को भी हरा चारा नहीं मिल रहाए जिससे दूध और मांस उत्पादन प्रभावित हो सकता है। बीमा समूह हाउडेन की रिपोर्ट के मुताबिक यूरोप कृषि क्षेत्र को सालाना 28 अरब यूरो का नुकसान हो रहा है। यह 2050 तक 40 अरब यूरो तक पहुंच सकता है। विनाशकारी वर्षों में नुकसान 90 अरब यूरो से ज्यादा हो सकता है।
 कुल नुकसान का 50 प्रतिशत से अधिक सिर्फ सूखे से
स्पेन और इटली को सालाना 20 अरब यूरो की क्षति
मध्य और दक्षिण.पूर्वी यूरोप में जीडीपी का 3 प्रतिशत तक नुकसान
केवल 20.30 प्रतिशत नुकसान ही बीमाकृत, बाकी का बोझ किसानों पर

भारत के लिए चेतावनी भी और अवसर भी

चीन और यूरोप की घटनाएं भारत के लिए भी संकेत हैं। भारत की कृषि भी मानसून पर निर्भर है, और जलवायु परिवर्तन के कारण यहां भी फसल जोखिम, बीमा पहुंच, और सिंचाई संसाधनों की सुदृढ़ता जैसे विषयों पर गंभीर काम करने की जरूरत है। हालांकि, दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी पकड़ को मजबूत बनाने के लिए ये एक अच्छा अवसर भी है। लेकिन इसके लिए सावधानी के साथ आगे बढऩा होगा ताकि आने वाले दिनों में खुद भारत को ऐसी समस्याओं का सामना न करना पड़े।  

जलवायु परिवर्तन बना जानलेवा – 2300 मौतें सिर्फ हीटवेव से

लंदन स्थित इंपीरियल कॉलेज और लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन द्वारा किए गए हालिया अध्ययन के मुताबिक, 2 जुलाई को समाप्त हुई 10 दिन की हीटवेव के दौरान यूरोप के 12 शहरों में कम से कम 2,300 लोगों की मौत हुई है। इनमें से लगभग 1,500 मौतें सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन के कारण हुईं। वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से तापमान में 4 डिग्री तक की बढ़ोतरी हुई है, जिससे यह हीटवेव अधिक घातक बन गई।

भारत के लिए चेतावनी भी, अवसर भी

चीन और यूरोप की यह स्थिति भारत के लिए गंभीर संकेत है। भारतीय कृषि भी मानसून पर निर्भर है और जलवायु परिवर्तन से यहां भी फसल उत्पादन संकट में पड़ सकता है। ऐसे में भारत को फसल बीमा, सिंचाई के बेहतर संसाधन, और जलवायु अनुकूल खेती की दिशा में ठोस कदम उठाने की ज़रूरत है।

हालांकि, यह संकट भारत के लिए निर्यात के नए अवसर भी खोलता है। जब वैश्विक बाजारों में खाद्य उत्पादन घटेगा, तब भारत अपनी कृषि ताकत के दम पर नए आयाम स्थापित कर सकता है — बशर्ते कि हम पहले से ही तैयारी में जुट जाएं।

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