हलधर किसान नई दिल्ली | देश के गांवों को स्वच्छ, आत्मनिर्भर और ऊर्जा संपन्न बनाने की दिशा में केंद्र सरकार की गोबरधन योजना एक मजबूत आधार बनकर उभरी है। स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के अंतर्गत वर्ष 2018 में शुरू की गई यह योजना आज ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नए अवसर पैदा कर रही है। गोबरधन यानी गैल्वनाइजिंग ऑर्गेनिक बायो-एग्रो रिसोर्सेज धन, अब केवल स्वच्छता का नहीं बल्कि आय, ऊर्जा और पर्यावरण संरक्षण का भी बड़ा माध्यम बन चुकी है।
केंद्रीय जल शक्ति राज्य मंत्री श्री वी. सोमन्ना ने राज्यसभा में लिखित उत्तर में बताया कि गोबरधन, एसबीएम-जी के तहत ठोस अपशिष्ट प्रबंधन का अनिवार्य घटक है। इसका मुख्य उद्देश्य पशुओं के गोबर, कृषि अवशेषों और अन्य जैविक कचरे को बायोगैस, संपीड़ित बायोगैस (सीबीजी) और जैविक खाद जैसे उपयोगी संसाधनों में बदलकर गांवों में स्वच्छता लाना और ग्रामीणों के जीवन स्तर को बेहतर बनाना है।
गोबरधन परियोजनाओं के माध्यम से ग्राम पंचायतों को प्रोत्साहित किया जा रहा है कि वे पशुओं के गोबर और ठोस कृषि अपशिष्ट को बायोगैस व बायो-स्लरी में परिवर्तित करें। इससे जहां एक ओर गांवों में खुले में गोबर और कचरे की समस्या खत्म होती है, वहीं दूसरी ओर इससे तैयार होने वाली गैस और खाद किसानों के लिए अतिरिक्त आमदनी का साधन बन रही है।
सरकार ने इस योजना को सफल बनाने के लिए विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के बीच समन्वय स्थापित किया है। ग्रामीण विकास, जल शक्ति, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस जैसे विभाग मिलकर इस पहल को आगे बढ़ा रहे हैं। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा गोबरधन पोर्टल पर दी गई जानकारी के अनुसार 27 जनवरी 2026 तक देशभर में बड़ी संख्या में संपीड़ित बायोगैस (सीबीजी) परियोजनाएं और सामुदायिक/क्लस्टर आधारित बायोगैस संयंत्र चालू हो चुके हैं।
इन परियोजनाओं का सबसे बड़ा लाभ यह है कि गांवों में रोजगार के नए अवसर पैदा हो रहे हैं। गोबर संग्रह, परिवहन, संयंत्र संचालन और खाद की बिक्री जैसे कार्यों से स्थानीय युवाओं को काम मिल रहा है। इसके साथ ही किसानों को अपने पशुओं के गोबर और फसल अवशेष बेचकर अतिरिक्त आय मिल रही है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है।
बायोगैस और सीबीजी के उत्पादन से गांवों को स्वच्छ और सस्ती ऊर्जा मिल रही है। कई जगहों पर यह गैस खाना पकाने, बिजली उत्पादन और वाहनों के ईंधन के रूप में इस्तेमाल की जा रही है। इससे डीजल और एलपीजी पर निर्भरता कम हो रही है और प्रदूषण में भी कमी आ रही है।
बायोगैस संयंत्रों से निकलने वाली बायो-स्लरी और जैविक खाद खेतों के लिए वरदान साबित हो रही है। यह मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती है, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटाती है और फसलों की उत्पादकता सुधारती है। इससे किसानों की लागत कम होती है और पैदावार बढ़ती है।
गोबरधन योजना का एक और बड़ा फायदा यह है कि इससे गांवों में स्वच्छता और स्वास्थ्य स्तर में सुधार हो रहा है। खुले में पड़े गोबर और कचरे से फैलने वाली गंदगी, दुर्गंध और बीमारियों पर अंकुश लग रहा है। गांव अधिक स्वच्छ और रहने योग्य बन रहे हैं।
कुल मिलाकर गोबरधन योजना ग्रामीण भारत को कचरे से कमाई की ओर ले जा रही है। यह योजना स्वच्छता, ऊर्जा, रोजगार और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़कर गांवों की तस्वीर बदल रही है। आने वाले वर्षों में जैसे-जैसे और अधिक बायोगैस और सीबीजी परियोजनाएं शुरू होंगी, वैसे-वैसे गांव आत्मनिर्भरता की ओर और तेज़ी से बढ़ेंगे। गोबरधन वास्तव में किसानों और गांवों के लिए “धन” साबित हो रहा है।
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