खरीफ बुवाई 2025: देशभर में रफ्तार पकड़ रही बुवाई, अब तक 89.29 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फसलें बोई गईं l

Kharif Sowing 2025 Sowing is gaining momentum across the country so far crops have been sown in 89.29 lakh hectare area

हलधर किसान नई दिल्ली l भारत में खरीफ बुवाई ने इस वर्ष जोरदार रफ्तार पकड़ी है। कृषि मंत्रालय द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, 13 जून 2025 तक देश में कुल खरीफ बुवाई क्षेत्र 89.29 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है। यह आंकड़ा पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 1.48 लाख हेक्टेयर अधिक है, जो खरीफ सीजन की सकारात्मक शुरुआत को दर्शाता है।

बुवाई में यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से धान, दलहन और तिलहन फसलों के बढ़े हुए रकबे के कारण हुई है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, समय पर मानसून की दस्तक और किसानों की बेहतर तैयारियों ने बुवाई की रफ्तार को गति दी है।

धान और दलहन में उल्लेखनीय वृद्धि
धान की बुवाई में इस साल 13% की वृद्धि देखी गई है। पिछले साल जहां यह रकबा 4 लाख हेक्टेयर था, वहीं इस साल यह बढ़कर 4.53 लाख हेक्टेयर हो गया है। बेहतर मौसम और बाजार की अनुकूल स्थिति को इसकी प्रमुख वजह माना जा रहा है।

वहीं दलहन फसलों का रकबा 18% बढ़कर 3.07 लाख हेक्टेयर हो गया है। मूंग और उड़द की बुवाई में विशेष प्रगति दर्ज की गई है, हालांकि अरहर के क्षेत्र में मामूली गिरावट आई है।

सोयाबीन ने तिलहन में दिखाई मजबूती
तिलहनों में सोयाबीन सबसे आगे रहा है। इसका रकबा इस वर्ष 66,000 हेक्टेयर की वृद्धि के साथ 2.05 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है। हालांकि मूंगफली की बुवाई में कुछ गिरावट दर्ज की गई है।

अन्य फसलें: गन्ना आगे, कपास में गिरावट
गन्ना इस खरीफ सीजन में सबसे अधिक क्षेत्रफल वाली फसल बना रहा। इसका रकबा 54.87 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 55.07 लाख हेक्टेयर हो गया है। इसके विपरीत, कपास का रकबा घटकर 13.19 लाख हेक्टेयर और जूट-मेस्टा का 5.48 लाख हेक्टेयर पर सिमट गया है।

मोटे अनाजों में भी मिश्रित रुझान देखने को मिला है। जहां बाजरा और ज्वार के क्षेत्र में वृद्धि दर्ज की गई, वहीं मक्का और रागी के रकबे में कमी आई है। कुल मिलाकर मोटे अनाजों का कुल क्षेत्रफल 5.89 लाख हेक्टेयर पर स्थिर रहा।

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भविष्य की दिशा मानसून पर निर्भर
विशेषज्ञों का मानना है कि शुरुआती मानसून और तैयारियों ने किसानों में आशा जगाई है। लेकिन आगे खरीफ फसलों की स्थिति काफी हद तक मानसून की प्रगति और वर्षा वितरण पर निर्भर करेगी।

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