हलधर किसान दिल्ली l इस बार देश के 22 राज्यों में जुगनू की गणना हुई, जिसमें 6139 जुगनू मिले। ग्राफिक एरा विवि ने 5 व 6 जुलाई को जुगनू दिवस पर गणना कराई। भौतिकवाद की चकाचौंध रात को टिमटिमाते जुगनू के अस्तित्व के लिए खतरा बन रही है। प्रकृति का यह सुंदर कीट विलुप्त होने की कगार पर पहुंच रहा है। इस बार देश के 22 राज्यों में 6139 जुगनू पाए गए हैं। बीते एक वर्ष में ही जुगनू की संख्या में देशभर में करीब 76 फीसदी कमी दर्ज की गई है।
गांव, कस्बों, नगर और महानगर शाम होते ही कृत्रिम प्रकाश की रोशनी में सराबोर हो रहे हैं, जिससे जुगनू का जीवन व्यापक रूप से प्रभावित हो रहा है। बीते 5 व 6 जुलाई को विश्व जुगनू दिवस पर ग्राफिक एरा विश्वविद्यालय देहरादून के वरिष्ठ प्रो. वीरेंद्र प्रसाद उनियाल और डा. निधि राणा की पहल पर देशभर में जुगनू की गणना की गई।भारतीय वन्य जीव संस्थान के सहयोग से दोनों वैज्ञानिकों ने विशेष क्यूआर कोड और लिंक की मदद से देश के 22 राज्यों में जुगनू की गणना कराई।
इस गणना उत्तराखंड, केरल, राजस्थान, यूपी, कर्नाटक, गुजरात, पंजाब, झारखंड, बिहार, हिमाचल प्रदेश आदि राज्यों के 232 लोग शामिल हुए। डॉ. वीपी उनियाल के अनुसार, इस बार जुगनू की संख्या में कमी पाई गई है। उन्होंने बताया कि गांव से लेकर महानगरों में रात्रि को अत्यधिक कृत्रिम प्रकाश से जुगनू के जीवन चक्र पर सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है। इस बार सिर्फ 6139 जुगनू मिले हैं, जो बीते वर्ष की तुलना में बहुत कम है। उन्होंने बताया कि बीते वर्ष 20 राज्यों में 26 हजार जुगनू पाए गए थे।
जुगनू की गणना एक वैश्विक पहल है जिसका उद्देश्य जुगनू की आबादी और वितरण पर डेटा एकत्र करना है। यह पहल “जुगनू दिवस” के दौरान 5 और 6 जुलाई को आयोजित की जाती है। इसका उद्देश्य शहरीकरण और कृषि पद्धतियों में बदलाव के कारण जुगनू पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करना है, और संरक्षण प्रयासों को बेहतर बनाने में मदद करना है।
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