हलधर किसान धार्मिक l श्राद्ध पक्ष में 16 दिन तक मनाये जाने वाला संजा पर्व अब मोबाइल और कम्प्यूटर के आधुनिक युग में लगभग विलुप्त होता जा रहा है। शहर में सीमेंट की इमारतें और दीवारों पर महंगे पेंट पुते होने गोबर का अभाव लड़कियों के ज्यादा संख्या में एक जगह न हो पाना, टीवी, इंटरनेट का प्रभाव और पढ़ाई पर जोर की वजह से शहरों में संजा मनाने का चलन लगभ खत्म सा हो गया है। हालांकि शहर की कुछ बस्तियों सहित ग्रामीण क्षेत्र में यह परंपरा आज भी जीवित है।
बुजुर्गों के अनुसार आधुनिकता की चकाचौंध ने लोक संस्कृति के कई रंगों को धूमिल कर कर दिया है। ऐसा ही एक खेल है संजा जो ग्रामीण अंचलों में श्राद्ध पक्ष के 16 दिन चलता था। कुछ वर्षो पूर्व नगरीय क्षेत्रों सहित अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों की युवतियां और बालिका संजा पर्व जिसे खेल के रुप में मनाया जाता है। शाम होते ही संझा गीत गाए जाते, जो वास्तव में बाल कविताएं है। इनके अर्थ और भाव के ध्वनि प्रधान शब्द और गाने वालों की मस्ती भरी सपाट शैली स्वत: अपनी और आकर्षित कर लेती थीं।

बड़े बुजुर्गों के अनुसार पहले के जमाने में दीवारों पर गाय के गोबर से यह आकृति बनाई जाती थी, लेकिन अब जमाना बदल गया, संझा गोबर से नहीं बनाते, उसका कारण यह भी है कि पहले कच्चे मकान हुआ करते थे, अब पक्के घर होने से दिवारे खराब हो जाती हैं। ग्रामीण अंचलों में यह त्यौहार श्राद्ध पक्ष के सोलह दिन चलता है। यूं तो तैयारियां तो प्रतिदिन सुबह से प्रारम्भ हो जाती थी, पर शाम होते-होते गांव की सारी युवतियां एंव बालिकाएं एक जगह इक्कठा हो जाया करती थी। फिर किसी दीवार को चिन्हांकित करके गोबर से उसको लीपकर उस पर जो कृतियां बनाते थे वाकई वो अद्भुत थीं।
खरगोन जिले के ग्राम मेनगांव में शकुंतला बाई ने बताया कि वह अपने मायके में संजा पर्व उत्साह के साथ मनाती थी। पर्व के दौरान गोबर से संजा की बड़ी आकृति बनाकर शाम को संजा माता की आरती कर संजा बाई के गीत, संजा माता जीम ले चूठ ले, जीमाऊं सारी रात, हाथी हथनी को घोड़ा-घोड़ी से बांधवों में तो नही जाऊ दादाजी ससुराल जैसे गीत गाये.. जाते थे। दीवारों पर अब भी गोबर से चांद, सितारे, सूर्य व कई प्रकार की आकृतियां बनाई जाती है। इन्हें रंग बिरंगे फूलों से सजाया जाता है। लेकिन शहरों में गोबर से दीवारों पर आकृतियां बनाने का चलन धीरे धीरे समाप्त होता जा रहा है। रेडिमेड संजा माता के चित्र को दिवारों पर लगाने की परंपरा प्रारंभ हो गई है।
16 को संजामाता महोत्सव, सिखाएंगे संज्ञा उकेरना
निमाड़ का प्रसिद्ध लोक संस्कृति संजा माता का समोहित रूप से रविवार को निमाड़ सहस्त्र औदीच्य ब्राह्मण महासभा के तत्वावधान में मनाने का निर्णय लिया गया।
खरगोन महासभा के संस्थापक पं. जगदीश ठक्कर ने बताया कि निमाड़ का अति प्राचीन यह संजा माता का त्यौहार धीरे-धीरे लूप्त दिखाई दे रहा है। इसलिए निमाड़ सहस्त्र औदीच्य ब्राह्मण समाज ने संस्कृति को बचाने व उसका महत्व को बनाये रखने के लिए निर्णय लिया है। पं. ठक्कर ने बताया कि यह लोकपर्व निमाड, मालवा का एक लोकप्रिय महोत्सव है। उत्सव का शुभारम्भ भाद्रपद की पूर्णिमा से होता है। यह प्रकृति का उत्सव है। संजा पूजन में महिलाओं को प्रकृति और पर्यावरण से जोड़े रखने का कार्य भी करता है।
जिला महिला अध्यक्ष श्रीमति सरोज दिनेश ठक्कर ने बताया कि यह महोत्सव एक दिवसीय होगा, जिसमें स्वजातीय मातृशक्ति या व बालिकायें भाग लेकर गाय के गोबर से संजा माता को बनायेंगे तथा निमाड़ के लोक गीत संजा माता के गायेंगे। महासभा के अध्यक्ष अजय ठक्कर राजपूर भी उपस्थित होंगे। खरगोन ईकाई अध्यक्ष सुभाष ठक्कर ने बताया कि भाग लेने वाले सभी को निमाड़ महासभा कि और से प्रशस्ति पत्र भी दिये जायेंगे। महासभा सदस्य श्रीमति पूर्वा व्यास ने सभी मातृशक्ति व बालिकाओं को महोत्सव में अधिक से अधिक संख्या में भाग लेने का आग्रह किया है।
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