हलधर किसान | विशेष समाचार मूंगफली के बीजों की गुणवत्ता और उनकी आनुवंशिक शुद्धता जांचने के लिए किए गए G.O.T. (Grow Out Test) परीक्षणों के परिणामों को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठाए गए हैं। इस विषय पर बीज कानून के जानकार एवं सेवानिवृत्त क्षेत्रीय प्रबंधक आर.बी. सिंह द्वारा लिखे गए लेख में परीक्षण की प्रक्रिया, निर्धारित मानकों और कानूनी वैधता से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर ध्यान आकर्षित किया गया है।
लेख में राजस्थान में मूंगफली के बीजों के परीक्षण से संबंधित मामले का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि किसी भी परीक्षण के परिणामों को मान्य मानने से पहले यह देखना आवश्यक है कि निर्धारित प्रक्रिया, तकनीकी मानकों और संबंधित अधिसूचनाओं का पालन किया गया था या नहीं।
15 नमूनों की जांच और परिणामों पर सवाल
लेख के अनुसार, राजस्थान सरकार द्वारा मूंगफली के 15 नमूनों की जांच कराई गई थी। इसमें एक नमूने के आनुवंशिक रूप से शुद्ध पाए जाने और शेष 14 नमूनों के मानक स्तर पर खरे नहीं उतरने की बात कही गई है।
हालांकि, लेख में इन परिणामों की वैधानिकता पर आपत्ति जताई गई है। इसमें संबंधित परीक्षण केंद्र और विश्लेषक की अधिसूचना सहित आवश्यक कानूनी प्रक्रियाओं की स्थिति पर सवाल उठाए गए हैं। लेखक का तर्क है कि यदि परीक्षण निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप नहीं हुआ है, तो उसके परिणामों को चुनौती दिए जाने का आधार बन सकता है।
इस संबंध में वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए संबंधित सरकारी रिकॉर्ड, परीक्षण रिपोर्ट और अधिसूचनाओं का परीक्षण महत्वपूर्ण होगा।
क्या है G.O.T. परीक्षण?
G.O.T. यानी ग्रो आउट टेस्ट बीज की आनुवंशिक शुद्धता और किस्म की पहचान से संबंधित परीक्षण है। इसमें बीजों को उगाकर पौधों के लक्षणों का निरीक्षण किया जाता है, ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि संबंधित फसल घोषित किस्म के अनुरूप है या नहीं।
लेख में कहा गया है कि इस प्रकार के परीक्षण में तुलना के लिए संबंधित प्रजनक के प्रमाणित संदर्भ बीज का उपयोग और वैज्ञानिक परीक्षण पद्धति का पालन महत्वपूर्ण है। इसमें R.B.D. (Randomized Block Design) के तहत परीक्षण दोहराव की प्रक्रिया का भी उल्लेख किया गया है।
लेखक ने सवाल उठाया है कि यदि नमूनों की जांच में आवश्यक तुलनात्मक व्यवस्था और निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ, तो परीक्षण के निष्कर्षों की विश्वसनीयता तथा कानूनी स्वीकार्यता पर प्रश्न खड़े हो सकते हैं।
बीज मानकों और नियमों के पालन का मुद्दा
लेख में भारतीय न्यूनतम बीज प्रमाणीकरण मानकों तथा वर्ष 1965, 1971, 1988 और 2013 के मानकों का संदर्भ देते हुए बीज और मूंगफली के दानों के बीच नियामकीय अंतर पर चर्चा की गई है। इसमें यह मुद्दा भी उठाया गया है कि मूंगफली के दानों को बीज के रूप में बेचने के मामले में लागू प्रावधानों और सरकारी अनुमति की स्थिति को स्पष्ट रूप से समझना आवश्यक है।
लेख में राजस्थान सरकार द्वारा मूंगफली के दानों को बीज के रूप में बेचने की अनुमति दिए जाने का उल्लेख भी किया गया है। इस विषय में संबंधित सरकारी आदेशों और लागू नियमों की आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है।
लेख में DNA परीक्षण और फिंगरप्रिंटिंग के माध्यम से किस्म की पहचान को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। इन तकनीकों की वर्तमान नियामकीय स्थिति तथा बीज कानून के अंतर्गत उनकी स्वीकार्यता के बारे में आधिकारिक नियमों के आधार पर ही निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए।
कृषि आदान कारोबार में नियमों के पालन की जरूरत
इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कृषि क्षेत्र से जुड़े श्रीकृष्ण दुबे ने कहा कि मूंगफली के बीजों का कारोबार कई वर्षों से इसी आधार पर पूरे देश में किया जा रहा है। उनके अनुसार, कृषि आदान क्षेत्र में ऐसी कई फसलें और उत्पाद हैं, जिनके संबंध में निर्धारित नियमों का पूरी तरह पालन नहीं हो पाने की शिकायतें सामने आती रहती हैं।

उन्होंने कहा कि यह समस्या केवल निजी क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि विभागीय कार्यप्रणाली और संबंधित अधिकारियों के स्तर पर भी कहीं-कहीं चूक देखने को मिलती है। यदि ऐसी कमियों को समय रहते पहचानकर सुधारा जाए, तो भविष्य में विवादों और परेशानियों से बचा जा सकता है।
श्री दुबे ने इस बात पर भी चिंता जताई कि कृषि मंत्रालय और संबंधित विभागों में कई बार महत्वपूर्ण तकनीकी एवं नियामकीय जानकारियों की पर्याप्त समझ नहीं दिखाई देती। उनके अनुसार, कृषि आदान क्षेत्र में पारदर्शिता और नियमों का प्रभावी पालन सुनिश्चित करने के लिए संबंधित सभी पक्षों को जागरूक होना आवश्यक है।

”बीज निरीक्षक की अधिनायक वादी प्रवृति“ आर.बी. सिंह, बीज कानून रत्न, एरिया मैनेजर (सेवानिवृत) नेशनल सीड्स
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