हलधर किसान इंदौर। बीज व्यापार को लेकर आने वाली समस्याओं को दूर करने और विसंगतियों को उजागर करने के लिये बीज कानूनों को बारीकी स्व जानने वाले श्री आरबी सिंह साहब आज के अंक में पाठकों को अथॉरटी लेटर को लेकर जानकारी दे रहे है। श्री सिंह साहब की कलम से…“Study of Seed Laws is not a problem but an opportunity to understand how legally we are sound”

कृषि उत्पादन को बीज उर्वरक एवं कीटनाशी आदान प्रभावित करते हैं। कीटनाशी की गुणवत्ता नियन्त्रण के लिये कीटनाशी अधिनियम है। उर्वरक के लिए उर्वरक नियन्त्रण आदेश 1985 एवं बीज की गुणवत्ता श्रेष्ठ रखने के लिये बीज अधिनियम-1966 एवं बीज नियम-1968 तथा बीज नियन्त्रण आदेश-1983 लागू है। इन तीनों आदानों की बिक्री नियमित करने के लिए राज्य सरकारों द्वारा लाइसैंस प्रदान किए जाते हैं। लाइसैंस प्राप्त करने के लिये अथॉर्टी लैटर, पी०सी० (Principal Certificate/सोर्स सर्टिफिकेट) की आवश्यकता पड़ती है। बीज कानूनों में अथॉर्टी/पी०सी०/ सोर्स सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं होती है परन्तु अधिकारियों में यह भ्रम बना रहता है और व्यापारियों को अनावश्यक प्रताड़ना मिलती रहती है।
1. कीटनाशी लाइसैंस :-
कीटनाशी नियम-1971 के नियम-10 (4) (A) में स्पष्ट उल्लेख है कीटनाशी विक्रय का लाइसैंस लेने हेतु प्रिंसीपल प्रमाण-पत्र प्रार्थना-पत्र के साथ देना आवश्यक है अन्यथा लाइसैंस ही जारी नहीं होगा। प्रिंसीपल प्रमाण-पत्र का प्रारूप भी फार्म-IX में दिया गया है, अतः यह निश्चित हुआ कि पी.सी. के बिना लाइसैंस जारी नहीं होगा।
2. उर्वरक लाइसैंस :-
उर्वरक नियन्त्रण आदेश 1985 की धारा-8(3) के परन्तुक Proviso में स्पष्ट अंकित है कि उर्वरक विक्रय लाइसैंस लेने के लिये सोर्स सर्टिफिकेट प्रार्थना-पत्र के साथ लगाना आवश्यक है। इतना ही नहीं सोर्स सर्टिफिकेट का प्रारूप / फोरमेट (ओ) में दिया गया है। इस तरह स्पष्ट है कि उर्वरक विक्रय लाइसैंस लेने क लिये दिये गये प्रार्थना-पत्र के साथ सॉर्स सर्टिफिकेट आवश्यक है अन्यथा लाइसैंस जारी ही नहीं होगा।
3. बीज विक्रय लाइसैंस :-
बीज के विक्रय को नियमित करने वाले बीज नियन्त्रण आदेश 1983, बीज अधिनियम-1966, बीज नियम-1968 किसी कानून की धारा में प्रिंसीपल प्रमाण-पत्र का प्रावधान नहीं है और न ही कोई प्रारूप / फॉर्मेट दिया गया है परन्तु बीज लाइसैंस अनुज्ञा अधिकारी, बीज निरीक्षक हर समय प्रिंसीपल सर्टिफिकेट की आड़ में बीज व्यापारियों का शोषण, दोहन करते रहते हैं। बीज व्यापारी अपनी कमियों के लिए तो दंडित होता है साथ ही अधिकारियों को बीज कानूनों के ज्ञान का अभाव होने का भी दण्ड भुगतना पड़ता है। बीज व्यापारी इतना निरीह है कि उसे अधिकारियों की अज्ञानता को भी अपनी नियती समझ कर उनके विधिक और अविधिक आदेशों की पालना करनी पड़ती है।
4. केन्द्रीय बीज प्रमाणीकरण बोर्ड :-
बीज विक्रय लाइसैंस जारी करने के लिए प्रिंसीपल सर्टिफिकेट की भ्रामक स्थिति बारे निदेशक कृषि उत्तर प्रदेश ने केन्द्रीय बीज प्रमाणीकरण बोर्ड से स्पष्टीकरण मांग लिया। उत्तर में उपायुक्त (गु०नि०) शास्त्री भवन, नई दिल्ली ने बीज नियन्त्रण आदेश 1983 की धारा-5 (1) का उद्दहरण (Citation) दिया जिसमें लिखा है कि ‘लाइसेंसिंग अधिकारी लाइसैंस देने से पूर्व कोई भी जानकारी कर जैसा वह उचित समझे लाइसैंस प्रदान कर सकता है” का सन्दर्भ दिया जिसके आधार पर बीज विक्रय लाइसैंस देने के लिये लाइसेंसिंग अधिकारी Princiapl Certificate (P.C.) या सोर्स सर्टिफिकेट (S.C.) मांग सकता है। यह सरासर गलत है क्योंकि प्रत्येक अधिनियम में लाइसेंसिंग प्राधिकारी को बाध्य किया गया है कि लाइसैंस प्रदान करने से पूर्व पूरी पड़ताल कर ही लाइसैंस दें। कीटनाशी नियम-1971 के नियम-12 “Condition of Licence” में स्पष्टतया लिखा है कि लाइसेंसिंग अधिकारी पूरी पड़ताल करके ही लाइसैंस दे यानि जैसा बीज नियन्त्रण आदेश की धारा-5 (1) में लिखा है। इसी प्रकार उर्वरक नियन्त्रण आदेश 1985 की धारा-9 शीर्षक Grant or Refusal of Certificate of registration में भी बहुत सारी Terms and condition और पड़ताल करने का प्रावधान है जैसे बीज नियन्त्रण आदेश-1983 की धारा-5 (1) में है परन्तु उसमें स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं है कि सीड सेल हेतु Source Certificate आवश्यक है अतः उपायुक्त (गुण नियन्त्रण) शास्त्री भवन, नई दिल्ली की दलील सही नहीं है।
5. संशोधन :-
यदि बीज विक्रय लाइसैंस के लिए प्रिंसीपल सर्टिफिकेट या सोर्स सर्टिफिकेट नितान्त आवश्यक है तो सरकार संशोधन करा ले तब बिना प्रिंसीपल प्रमाण-पत्र दिए लाइसैंस बनेगा ही नहीं और यह भ्रम की स्थिति नहीं रहेगी और बीज व्यापारियों का दोहन नहीं होगा।
6. लाइसैंस स्वीकृति के बाद पी०सी० :-
इन्सैक्टीसाईड या उर्वरक लाइसेंस बिना पी०सी० या एस०सी० नहीं प्रदान किया जायेगा हालांकि व्यापारी द्वारा किसी अन्य संस्था का कीटनाशी या उर्वरक की बिक्री के लिए नया अनुबन्ध किया है तो उसका पी०सी० या एस०सी० बाद में जुड़वाया जाता है परन्तु बीज विक्रय लाइसैंस स्वीकृत करने के बाद पी०सी० की आड़ में व्यापारियों का दोहन किया जाता है और बीज निरीक्षक / बीज लाइसेंसिंग अधिकारी यानि बीज कानूनों के रक्षक बीज कानूनों के बाहर जाकर कार्यवाही करते हैं दोषी हैं।
7. पी०सी० आवश्यक नहीं :-
हरियाणा एक मात्र सरकार है जहाँ पी०सी० की मांग नहीं की जाती है। हिमाचल प्रदेश ने भी सूचना के अधिकार के तहत सूचित किया कि लाइसैंस प्राप्त करने के लिए पी०सी० की शर्त हटा दी है। इसी प्रकार बिहार राज्य ने भी सूचित किया हुआ है कि लाइसैंस प्राप्त करने हेतु पी०सी० की शर्त नहीं है। आन्ध्र प्रदेश सरकार ने 25.06.1994 यानि 30 साल पहले ही अपने अधिकारियों को समूचित आदेश पारित कर रखे हैं कि व्यापारियों को पी०सी० देने के लिए दबाव न डाला जाए। आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने तेलंगाना राज्य के लिए याचिका 18365 का निर्णय देते हुए बताया कि सोर्स सर्टिफिकेट बीज विक्रय की शर्त नहीं हो सकती क्योंकि बीज के हर पैकिंग पर निर्मीता / उत्पादक का पता लिखा होता है। श्री एन.वी. पाटिल बनाम स्टेट ऑफ कर्नाटक की लगभग 40 याचिकाओं का बैंगलोर उच्च न्यायालय ने दिनांक 15.11.1999 को निर्णय देते हुए लिखा है कि विक्रेता पर यह दायित्व नहीं है कि वह बताए कि बीज कहाँ से खरीदा।
8. नोटिस ही दोष पूर्ण :-
उत्तर प्रदेश सरकार के एक जिला कृषि अधिकारी ने 09.10.2024 को जिले के बीज व्यवहारियों को दोषपूर्ण नोटिस (संलग्न) जारी किया जो स्वतः ही चुनौतीपूर्ण है। उन्होंने लिखा है कि जिन कम्पनियों को बीज अनुज्ञप्ती पत्र (Licence) पर अथॉर्टी (फार्म-ओ) अंकित हो वह प्रतिष्ठान यानि Sale Counter पर उपलब्ध हो। सर्वप्रथम तो अधिकारी बीज कानून से भली विधि परिचित नहीं है। जिला कृषि अधिकारी को बीज कानूनों की सीमाओं के अन्दर हुए उलंघनों की रोकथाम करनी है और बीज कानूनों में कहीं भी प्रिंसीपल प्रमाण-पत्र या सोर्स सर्टिफिकेट की आवश्यकता नहीं है।
अधिकारी को समूचित ज्ञान नहीं है कि फार्म-ओ उर्वरक के सोर्स सर्टिफिकेट के लिए है न की बीज के लिये। विक्रय लाइसैंस लेने के लिये जो प्रमाण-पत्र दिया जाता है उसे सोर्स सर्टिफिकेट कहते हैं और कीटनाशी लाइसैंस लेने के लिये दिए गये प्रमाण-पत्र को प्रिंसीपल प्रमाण-पत्र कहते हैं।
9. फार्म-ओ लाइसैंस में अंकित हो :-
जिला कृषि अधिकारी ने आगे आदेश दिए हैं कि फार्म-ओ में अथॉर्टी लाइसैंस पर अंकित हो। किसी बीज कानून में ऐसा करने का उल्लेख नहीं मिलेगा। ऐसा ही दकयानूसी ऐलान एक बार वर्ष 2009 में राजस्थान सरकार ने जारी किया परन्तु वाद में वापिस लेना पड़ा। जिला कृषि अधिकारी ने उपरोक्त आदेशों की पालना न करने पर सेलकाउन्टर को सील करने की धमकी भी दी। अतः ऐसे अधिकारियों के भरोसे बीज कानूनों की पालना कैसे होगी, यह विचारणीय विषय है।
10. समाधान :-
इस प्रकार की समस्याओं का समाधान व्यक्तिगत रूप से नहीं हो सकेगा बल्कि सामुहिक शक्ति से सम्भव हो सकेगा क्योंकि आजकल ‘संघे शक्ति कलयुगे” की अवधारणा प्रचलित है। संघ के पदाधिकारी कृषि विभाग के उच्च अधिकारियों संग तथ्यों के साथ बैठक कर समाधान कराये और साथ ही बैठक की कार्यवाही की एक कॉपी बैठक के तुरन्त बाद लें और स्थानीय अधिकारियों को पहुँच कराये।
11. जी०एस०टी० :-
बीज निरीक्षक और लाइसेंसिंग प्राधिकारी बीज अधिनियम-1966, बीज नियम-1968 तथा बीज नियन्त्रण आदेश के प्रावधानों के लिये नियुक्त होते हैं और इन कानूनों के बाहर जाकर की गई कार्यवाही अविधिक है। जी०एस०टी० की जाँच करने जी०एस०टी० को लागू करने का अधिकार बीज निरीक्षक एवं लाइसेंसिंग अधिकारी को नहीं है। इसके लिए काराधान विभाग है। बीज निरीक्षक को बिल प्रस्तुत करना जरूरी है परन्तु उस पर जी.एस.टी. लगेगा या नहीं यह बीज निरीक्षक के दायरे से बाहर है।
इसलिये मेरा कहना है कि :-
अब अमल में लाना होगा बीज कानून ज्ञान को। हर दिन न्यायिक चुनौति मिल रही बीज आदान को ।।
:: लोकोक्ति::
अद्भुत है बीज का अंकुरण
स्वयं को होम कर, करता नया सृजन।
– सौजन्य से –
श्री संजय रघुवंशी, प्रदेश संगठन मंत्री, कृषि आदान विक्रेता संघ मप्र
श्री कृष्णा दुबे, अध्यक्ष, जागरुक कृषि आदान विक्रेता संघ इंदौर

साभार:
आर.बी. सिंह, बीज कानून रत्न, एरिया मैनेजर (सेवानिवृत) नेशनल सीड्स कारपोरेशन लि० (भारत सरकार का संस्थान) सम्प्रति “कला निकेतन, ई-70, विथिका-11, जवाहर नगर, हिसार-125001 (हरियाणा), दूरभाष सम्पर्क-79883-04770, 94667-46625 (WhatsApp)
