असम में जंगली धान संरक्षण को बड़ी सफलता, सोनितपुर का बोरजुली बना जैव विविधता धरोहर स्थल

Major success in wild rice conservation in Assam

हलधर किसान नई दिल्ली/गुवाहाटी। भारत की कृषि जैव विविधता के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल हुई है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत राष्ट्रीय वर्षा आधारित क्षेत्र प्राधिकरण (एनआरएए) द्वारा वित्तपोषित ‘जंगली धान (ओरिज़ा रूफ़ीपोगोन) के यथास्थान संरक्षण एवं प्रबंधन’ परियोजना ने असम में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। इस परियोजना के अंतर्गत असम के सोनितपुर जिले के बोरजुली क्षेत्र को राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण द्वारा ‘जैव विविधता धरोहर स्थल (Biodiversity Heritage Site)’ के रूप में अधिसूचित किया गया है। इसे भारत में जंगली धान की दुर्लभ आनुवंशिक संपदा के संरक्षण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।

यह परियोजना वर्ष 2022 से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद–राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (आईसीएआर-एनबीपीजीआर), नई दिल्ली द्वारा असम राज्य जैव विविधता बोर्ड के सहयोग से संचालित की जा रही है। परियोजना का मुख्य उद्देश्य जंगली धान की प्राकृतिक प्रजातियों की पहचान, संरक्षण, वैज्ञानिक अध्ययन तथा भविष्य की कृषि आवश्यकताओं के अनुरूप उनके आनुवंशिक गुणों का उपयोग सुनिश्चित करना है।

हाल ही में आईसीएआर-एनबीपीजीआर के वैज्ञानिकों के एक प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रीय वर्षा आधारित क्षेत्र प्राधिकरण (एनआरएए) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. चंद्र शेखर कुमार (आईएएस) से मुलाकात कर परियोजना की उपलब्धियों की विस्तृत जानकारी साझा की। वैज्ञानिकों ने बताया कि परियोजना के अंतर्गत जंगली धान के अनेक महत्वपूर्ण जर्मप्लाज्म की पहचान की गई है तथा उनके संरक्षण एवं विशेषताओं के अध्ययन का कार्य सफलतापूर्वक आगे बढ़ रहा है। इसी प्रयास का परिणाम है कि सोनितपुर जिले का बोरजुली क्षेत्र अब देश के महत्वपूर्ण जैव विविधता धरोहर स्थलों में शामिल हो गया है।

विशेषज्ञों के अनुसार ओरिज़ा रूफ़ीपोगोन आधुनिक धान की कई किस्मों का मूल जंगली पूर्वज माना जाता है। इसमें सूखा, बाढ़, रोग एवं कीटों के प्रति प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता जैसे अनेक महत्वपूर्ण गुण पाए जाते हैं। यही कारण है कि भविष्य में जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना करने वाली नई धान किस्मों के विकास में यह प्रजाति अत्यंत उपयोगी साबित हो सकती है।

एनआरएए के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. चंद्र शेखर कुमार ने अनुसंधान दल के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि जंगली धान की प्रजातियाँ भारत की अमूल्य आनुवंशिक धरोहर हैं। इनके संरक्षण से ऐसी नई धान किस्मों का विकास संभव होगा जो बदलते मौसम, सूखा, बाढ़ और अन्य प्राकृतिक चुनौतियों का सामना करने में सक्षम होंगी। उन्होंने कहा कि भविष्य की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केवल अधिक उत्पादन ही नहीं, बल्कि जलवायु-अनुकूल और टिकाऊ कृषि प्रणाली विकसित करना भी आवश्यक है।

उन्होंने इस अवसर पर यह भी सुझाव दिया कि जिस प्रकार जंगली धान के संरक्षण के लिए यह परियोजना सफल रही है, उसी प्रकार देशभर में अन्य फसलों के जंगली संबंधी पौधों के संरक्षण के लिए भी व्यापक स्तर पर अभियान चलाए जाने चाहिए। इससे भारत की कृषि अनुसंधान क्षमता मजबूत होगी और आने वाली पीढ़ियों के लिए महत्वपूर्ण आनुवंशिक संसाधनों को सुरक्षित रखा जा सकेगा।

कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण खेती लगातार नई चुनौतियों का सामना कर रही है। कभी अनियमित वर्षा, तो कभी अत्यधिक गर्मी और नई बीमारियां किसानों के लिए चिंता का कारण बन रही हैं। ऐसे समय में जंगली प्रजातियों में मौजूद प्राकृतिक गुण आधुनिक फसल किस्मों को अधिक मजबूत और उत्पादक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए जैव विविधता संरक्षण केवल पर्यावरण का विषय नहीं, बल्कि किसानों की आय, खाद्य सुरक्षा और टिकाऊ कृषि से भी सीधे जुड़ा हुआ है।

परियोजना के अंतर्गत स्थानीय समुदायों को भी संरक्षण अभियान से जोड़ने पर विशेष जोर दिया गया है। ग्रामीणों और किसानों को जंगली धान की उपयोगिता तथा उसके संरक्षण के महत्व के बारे में जागरूक किया जा रहा है, ताकि प्राकृतिक आवासों की रक्षा के साथ-साथ जैव विविधता भी सुरक्षित रह सके।

बैठक में एनआरएए के निदेशक (कृषि एवं उद्यानिकी) डॉ. पंकज कुमार शाह तथा तकनीकी विशेषज्ञ (जलागम प्रबंधन) डॉ. अनिल कुमार मिश्रा भी उपस्थित रहे। सभी अधिकारियों ने परियोजना को देश में कृषि जैव विविधता संरक्षण का एक सफल मॉडल बताते हुए भविष्य में इसे अन्य राज्यों तक विस्तार देने की आवश्यकता पर बल दिया।

भारत विश्व के प्रमुख धान उत्पादक देशों में शामिल है। ऐसे में जंगली धान जैसी आनुवंशिक संपदा का संरक्षण भविष्य की कृषि नीति, अनुसंधान और खाद्य सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सोनितपुर के बोरजुली क्षेत्र को जैव विविधता धरोहर स्थल का दर्जा मिलना न केवल असम बल्कि पूरे देश के लिए गर्व की बात है और यह आने वाले समय में जलवायु-सहिष्णु कृषि विकास की दिशा में एक मजबूत आधार सिद्ध होगा।

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