बीज गुणवत्ता की शिकायतों में एकतरफा कार्रवाई पर उठाए सवाल, नियम 23-ए, खेत निरीक्षण और मध्य प्रदेश शासन के आदेश का किया उल्लेख
हलधर किसान विशेष रिपोर्ट। फसल खराब होने पर किसानों द्वारा बीज विक्रेताओं और कृषि आदान कंपनियों के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराने के मामले लगातार चर्चा में रहते हैं। किसानों की फसल को नुकसान होने पर उन्हें न्याय और उचित क्षतिपूर्ति मिलना आवश्यक है, लेकिन किसी भी व्यापारी या कंपनी की जिम्मेदारी निर्धारित करने से पहले शिकायत की निष्पक्ष एवं वैज्ञानिक जांच भी उतनी ही जरूरी है। इसी विषय को प्रमुखता से उठाते हुए बीज कानून विशेषज्ञ एवं नेशनल सीड्स कॉरपोरेशन लिमिटेड (भारत सरकार के संस्थान) के सेवानिवृत्त एरिया मैनेजर आर.बी. सिंह ने अपने आलेख “कृषक क्षतिपूर्ति में पिसता बीज व्यापारी” में बीज गुणवत्ता संबंधी शिकायतों की जांच प्रक्रिया, कानूनी प्रावधानों और कृषि आदान व्यापारियों के सामने आने वाली चुनौतियों पर विस्तार से प्रकाश डाला है।
आर.बी. सिंह ने अपने आलेख में इस बात पर जोर दिया है कि बीज की गुणवत्ता के कारण फसल खराब होने की शिकायतों का निपटारा केवल कृषि विभाग के निरीक्षण या फसल क्षति के सामान्य आकलन के आधार पर नहीं होना चाहिए। जांच में लागू कानूनी प्रावधानों, बीज के नमूनों, उसकी गुणवत्ता, संबंधित लॉट और फसल खराब होने के वास्तविक कारणों को ध्यान में रखना आवश्यक है। उनका आलेख कृषि आदान व्यापारियों के लिए यह समझने का आधार प्रस्तुत करता है कि शिकायतों के मामलों में निर्धारित प्रक्रिया का पालन और तकनीकी साक्ष्यों का महत्व कितना अधिक है।
बीज नियम 23-ए में जांच की निर्धारित प्रक्रिया
आर.बी. सिंह ने अपने दस्तावेज में बीज अधिनियम, 1966 तथा बीज नियम, 1968 का उल्लेख करते हुए बताया है कि बीज की गुणवत्ता के कारण फसल खराब होने की लिखित शिकायत मिलने पर बीज निरीक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
दस्तावेज में उद्धृत बीज संशोधन नियमों के नियम 23-ए के अनुसार, शिकायत की जांच में बीज के स्रोत की पहचान के लिए उपलब्ध पैकेट, लेबल और अप्रयुक्त बीज के नमूने सुरक्षित करने की प्रक्रिया का प्रावधान है। संबंधित लॉट के नमूनों को राज्य बीज परीक्षण प्रयोगशाला में विश्लेषण के लिए भेजकर फसल खराब होने के कारणों की जांच की जा सकती है। इसके बाद जांच के निष्कर्ष सक्षम प्राधिकारी को प्रस्तुत किए जाते हैं।
यदि जांच में यह निष्कर्ष निकलता है कि संबंधित बीज केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित न्यूनतम गुणवत्ता मानकों से कम स्तर का था और फसल की विफलता का कारण वही है, तो संबंधित आपूर्तिकर्ता के खिलाफ अधिनियम अथवा नियमों के उल्लंघन के संबंध में कार्रवाई की जा सकती है।
इस प्रक्रिया का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बीज की गुणवत्ता को लेकर लगाए गए आरोपों का निर्णय तकनीकी जांच और प्रमाणों के आधार पर हो।
खेत निरीक्षण में वैज्ञानिक पद्धति और निष्पक्षता जरूरी
आर.बी. सिंह ने अपने आलेख में फसल क्षति के आकलन के दौरान वैज्ञानिक निरीक्षण की आवश्यकता पर भी जोर दिया है। उनके अनुसार, केवल आंखों से देखकर या अनुमान के आधार पर फसल में नुकसान का प्रतिशत तय करने के बजाय निरीक्षण की निर्धारित पद्धति और उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्यों का सहारा लिया जाना चाहिए।
बीज की पहचान, संबंधित लॉट, उपलब्ध नमूनों और फसल की स्थिति की जांच महत्वपूर्ण है। यदि किसान के पास बीज का नमूना उपलब्ध नहीं है, तो दस्तावेज में अन्य संभावित स्रोतों से नमूने प्राप्त करने की प्रक्रिया पर भी चर्चा की गई है। इसमें विक्रेता, उत्पादक अथवा प्रमाणित बीज से संबंधित संस्थाओं के पास उपलब्ध नमूनों और आवश्यक परिस्थितियों में खेत में खड़ी फसल से नमूना लेने की संभावनाओं का उल्लेख है।
आलेख में यह भी कहा गया है कि खेत के निरीक्षण के दौरान संबंधित व्यापारी या बीज एजेंसी के प्रतिनिधि को शामिल करने तथा निरीक्षण रिपोर्ट उपलब्ध कराने की प्रक्रिया महत्वपूर्ण है। इससे जांच में पारदर्शिता आती है और संबंधित पक्ष को अपनी बात रखने का अवसर मिलता है।
मध्य प्रदेश शासन के आदेश का भी किया उल्लेख
आर.बी. सिंह के दस्तावेज में मध्य प्रदेश शासन के कृषि विभाग के 29 अप्रैल 2004 के आदेश का उल्लेख किया गया है। दस्तावेज के अनुसार, बीजों के नुकसान एवं अंकुरण संबंधी शिकायत मिलने पर जिला स्तरीय जांच प्रतिवेदन एक सप्ताह के भीतर प्रस्तुत करने की व्यवस्था बताई गई है।
इसमें जांच के लिए स्थायी समिति गठित करने का प्रावधान दर्ज है। समिति में कृषि विभाग के अधिकारी, कृषि वैज्ञानिक, सहायक बीज प्रमाणीकरण अधिकारी तथा संबंधित बीज प्रसंस्करण संस्था के प्रभारी या प्रतिनिधि को शामिल करने का उल्लेख है।
यह व्यवस्था इस बात को रेखांकित करती है कि बीज से जुड़ी शिकायतों में तकनीकी विशेषज्ञता और संबंधित पक्ष की भागीदारी महत्वपूर्ण है। हालांकि, किसी मामले में वर्तमान में लागू प्रक्रिया निर्धारित करने के लिए संबंधित विभाग से प्रावधानों की पुष्टि आवश्यक है।
न्यायिक मामलों से भी सामने आती है प्रक्रिया की अहमियत
आर.बी. सिंह ने अपने दस्तावेज में जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर के उपभोक्ता विवाद मंचों तथा विभिन्न न्यायालयों से संबंधित कई मामलों का उल्लेख किया है। इनमें बीज कंपनियों, बीज विक्रेताओं और कृषि आदान उत्पादों से जुड़े विवाद शामिल हैं। उन्होंने ऐसे मामलों के संदर्भ में जांच प्रक्रिया, वैज्ञानिक आकलन और संबंधित पक्ष को निरीक्षण में शामिल करने जैसे बिंदुओं की महत्ता बताई है।
इन मामलों का उल्लेख करते हुए उनका मुख्य संदेश है कि फसल क्षति के विवादों में केवल आरोपों के आधार पर निष्कर्ष निकालने के बजाय दस्तावेजी साक्ष्य, तकनीकी जांच और लागू नियमों को महत्व दिया जाना चाहिए।
कृष्णा दुबे ने भी उठाया निष्पक्ष जांच का मुद्दा
आर.बी. सिंह द्वारा उठाए गए विषय पर प्रतिक्रिया देते हुए कृषि आदान व्यवसाय से जुड़े कृष्णा दुबे ने कहा कि प्रदेश के विभिन्न जिलों और तहसीलों में बीज, कीटनाशक दवाइयों तथा जैविक खाद को लेकर शिकायतें सामने आती रहती हैं। कई मामलों में फसल अपेक्षित परिणाम नहीं देती, तो सीधे व्यापारी को जिम्मेदार ठहराकर मुआवजे की मांग की जाने लगती है।

दुबे के अनुसार, फसल की स्थिति के पीछे बीज या कृषि आदान की गुणवत्ता के अतिरिक्त बुवाई का तरीका, सिंचाई, खाद एवं दवाइयों का उपयोग और मौसम जैसी परिस्थितियां भी जिम्मेदार हो सकती हैं। इसलिए वास्तविक कारणों की जांच किए बिना किसी व्यापारी को दोषी ठहराना उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि यदि किसी उत्पाद की गुणवत्ता में कमी प्रमाणित होती है, तो संबंधित पक्ष के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यदि शिकायत का कारण कुछ अन्य परिस्थितियां हैं, तो उन्हें भी जांच में सामने लाया जाना आवश्यक है।
प्रशासन और मीडिया से भी निष्पक्षता की अपेक्षा
कृष्णा दुबे ने कहा कि किसान को अपनी समस्या अधिकारियों के सामने रखने का पूरा अधिकार है। वहीं, प्रशासन को शिकायत मिलने पर संबंधित कृषि अधिकारियों और तकनीकी विशेषज्ञों के माध्यम से नियमानुसार जांच करानी चाहिए। मीडिया को भी किसी मामले को प्रमुखता से प्रकाशित करने से पहले खेत की वास्तविक स्थिति, उपलब्ध प्रमाण और संबंधित व्यापारी का पक्ष जानने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि किसान और कृषि आदान व्यापारी एक-दूसरे के पूरक हैं। किसानों को गुणवत्तापूर्ण कृषि आदान उपलब्ध कराना जरूरी है, वहीं व्यापारियों के साथ भी निष्पक्ष व्यवहार होना चाहिए। लगातार विवादों और एकतरफा आरोपों से कृषि आदान व्यवसाय के प्रति भरोसा प्रभावित हो सकता है।

”बीज निरीक्षक की अधिनायक वादी प्रवृति“ आर.बी. सिंह, बीज कानून रत्न, एरिया मैनेजर (सेवानिवृत) नेशनल सीड्स
कारपोरेशन लि॰ (भारत सरकार का संस्थान) सम्प्रति – ”कला निकेतन“, ई-70, विथिका-11, जवाहर नगर, हिसार-125001 (हरियाणा), दूरभाष सम्पर्क-79883-04770, 94667-46625
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