शुक्र तारा अस्त होने से अक्टूबर में गृह प्रवेश और मांगलिक कार्यों के शुभ मुहूर्त पर विराम, नवंबर में फिर खुलेंगे गृह प्रवेश के द्वार
हलधर किसान अजमेर। शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व 11 अक्टूबर 2026, रविवार से शुरू होने जा रहा है। नौ दिनों तक चलने वाले इस धार्मिक महापर्व में श्रद्धालु मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना कर सुख, समृद्धि, आरोग्य और खुशहाली की कामना करेंगे। इस वर्ष नवरात्रि के दौरान गुरु और चंद्रमा की विशेष स्थिति के कारण गजकेसरी योग बनने की ज्योतिषीय चर्चा है। ज्योतिषीय मान्यताओं में इस योग को ज्ञान, प्रतिष्ठा, आत्मविश्वास और आर्थिक उन्नति से जोड़कर देखा जाता है। वहीं, शुक्र तारा अस्त रहने के कारण गृह प्रवेश सहित कुछ मांगलिक कार्यों के शुभ मुहूर्त को लेकर भी विशेष ध्यान देने की सलाह दी जा रही है।
ज्योतिषाचार्य डॉ. सुदीप जैन (सोनी), अजमेर के अनुसार, नवरात्रि का पर्व धार्मिक आस्था और आध्यात्मिक साधना की दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। इस दौरान श्रद्धालु घरों और मंदिरों में घट स्थापना कर नौ दिनों तक मां दुर्गा की आराधना करते हैं। व्रत, दुर्गा सप्तशती पाठ, मंत्र जाप, हवन और कन्या पूजन जैसे धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से भक्त देवी की कृपा प्राप्त करने की कामना करते हैं।
क्या होता है गजकेसरी योग?
वैदिक ज्योतिष में गजकेसरी योग को शुभ योगों में गिना जाता है। सामान्य ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार, जब गुरु ग्रह चंद्रमा से केंद्र भाव अर्थात पहले, चौथे, सातवें या दसवें भाव में स्थित होता है, तब इस योग का निर्माण माना जाता है। गुरु को ज्ञान, धर्म, विवेक और विस्तार का कारक माना जाता है, जबकि चंद्रमा मन, भावनाओं और मानसिक स्थिति से जुड़ा माना जाता है।
इन दोनों ग्रहों की विशेष स्थिति से बनने वाले गजकेसरी योग को ज्योतिषीय परंपरा में मान-सम्मान, निर्णय क्षमता, सामाजिक प्रतिष्ठा और आर्थिक प्रगति से जोड़ा जाता है। नवरात्रि जैसे पवित्र पर्व के दौरान इस योग की चर्चा श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का विषय बनती है। हालांकि, किसी व्यक्ति की कुंडली में योग का प्रभाव उसकी ग्रह स्थिति, भावों और अन्य ज्योतिषीय परिस्थितियों के आधार पर अलग-अलग माना जाता है। इन प्रभावों को धार्मिक एवं ज्योतिषीय मान्यताओं के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
11 अक्टूबर को घट स्थापना, 20 अक्टूबर को दशहरा
पंचांग संबंधी उपलब्ध जानकारी के अनुसार, शारदीय नवरात्रि की शुरुआत 11 अक्टूबर, रविवार को घट स्थापना के साथ होगी। इस दिन घरों और मंदिरों में कलश स्थापना कर मां दुर्गा का आह्वान किया जाएगा। श्रद्धालु नौ दिनों तक विधि-विधान से पूजा-अर्चना करेंगे। नवरात्रि का समापन 19 अक्टूबर को महानवमी के साथ होगा, जबकि 20 अक्टूबर 2026 को विजयादशमी यानी दशहरा मनाया जाएगा।
घट स्थापना को नवरात्रि के प्रमुख धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल किया जाता है। इसे शक्ति की उपासना, शुभ संकल्प और आध्यात्मिक साधना की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालु पूजा स्थल की सफाई कर कलश स्थापित करते हैं और नौ दिनों तक नियमित रूप से देवी की आराधना करते हैं।
घट स्थापना के शुभ समय को लेकर विशेष ध्यान
ज्योतिषाचार्य द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, 11 अक्टूबर को घट स्थापना के लिए सुबह 6 बजकर 19 मिनट से 10 बजकर 12 मिनट तक का समय बताया गया है। वहीं, अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक रहेगा। श्रद्धालु अपनी स्थानीय परिस्थितियों और परंपराओं के अनुसार पूजा का समय निर्धारित कर सकते हैं।
पंचांग और स्थानीय सूर्योदय के आधार पर मुहूर्त में अंतर संभव है। इसलिए घट स्थापना से पहले अपने क्षेत्र के विश्वसनीय पंचांग या स्थानीय विद्वान से समय की पुष्टि करना उचित रहेगा।
शुक्र तारा अस्त, मांगलिक कार्यों पर पड़ सकता है असर
ज्योतिषाचार्य डॉ. सुदीप जैन (सोनी) के अनुसार, शुक्र तारा अस्त रहने की स्थिति में पारंपरिक मुहूर्त विचार के तहत गृह प्रवेश, नया व्यापार शुरू करने, सगाई और वाहन खरीद जैसे कुछ मांगलिक कार्यों को टालने की परंपरा है। ऐसे में जिन परिवारों ने अक्टूबर में नए घर में प्रवेश करने या किसी महत्वपूर्ण शुभ कार्य की योजना बनाई है, वे संबंधित पंचांग के अनुसार मुहूर्त की जांच कर सकते हैं।
ज्योतिषीय परंपरा में शुक्र ग्रह को वैवाहिक सुख, भौतिक सुविधाओं, वैभव और ऐश्वर्य से जोड़ा जाता है। इसी कारण शुक्र के अस्त होने की अवधि में कुछ मांगलिक कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त निकालने से पहले विशेष विचार किया जाता है। हालांकि, धार्मिक अनुष्ठान, नवरात्रि पूजा और देवी आराधना अपनी परंपरा के अनुसार की जा सकती है।
नवंबर में फिर मिल सकते हैं गृह प्रवेश के मुहूर्त
जिन परिवारों ने अक्टूबर में गृह प्रवेश करने की योजना बनाई है, उन्हें शुक्र के उदय के बाद उपलब्ध होने वाले शुभ मुहूर्तों पर विचार करना पड़ सकता है। नवंबर में गृह प्रवेश के अवसर उपलब्ध होने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि, किसी भी संस्कार के लिए सटीक तिथि निर्धारित करते समय स्थान, तिथि, लग्न और पारिवारिक परंपरा को ध्यान में रखना जरूरी है।
ज्योतिषाचार्य के अनुसार, शुक्र तारा अस्त होने का ऐसा संयोग लगभग चार साल बाद बनने की बात कही जा रही है। इससे पहले वर्ष 2022 में भी शारदीय नवरात्रि के दौरान शुक्र अस्त होने की स्थिति बनी थी। उस वर्ष नवरात्रि 26 सितंबर से शुरू हुई थी और 1 अक्टूबर को शुक्र अस्त हुआ था।
विजयादशमी को माना जाता है अबूझ मुहूर्त
20 अक्टूबर को मनाई जाने वाली विजयादशमी का हिंदू परंपरा में विशेष महत्व है। इस दिन को कई स्थानों पर अबूझ मुहूर्त के रूप में माना जाता है। मान्यता के अनुसार, विजयादशमी पर नए कार्यों की शुरुआत, शस्त्र पूजन और अन्य शुभ गतिविधियां करना मंगलकारी होता है। हालांकि, गृह प्रवेश और अन्य विशेष संस्कारों के लिए स्थानीय पंचांग तथा परिवार की परंपरा के अनुसार सलाह लेना उचित रहेगा।
नौ दिनों तक होगी मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना
शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। इनमें मां शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री शामिल हैं। प्रत्येक स्वरूप को शक्ति, साधना, साहस, ज्ञान और कल्याण का प्रतीक माना जाता है।
दस महाविद्या ज्योतिष केंद्र से जुड़े ज्योतिषाचार्य श्री सोनी ने शुक्र तारा अस्त होने के साथ मौसम में बदलाव की संभावना का भी उल्लेख किया। हालांकि, मौसम में वास्तविक बदलाव का आकलन मौसम विभाग के पूर्वानुमान से ही किया जाना चाहिए।
कुल मिलाकर, शारदीय नवरात्रि 2026 श्रद्धालुओं के लिए भक्ति, साधना और धार्मिक अनुष्ठानों का महत्वपूर्ण अवसर लेकर आ रही है। गजकेसरी योग की ज्योतिषीय चर्चा और घट स्थापना के शुभ समय के बीच भक्त मां दुर्गा की आराधना की तैयारियों में जुटेंगे। वहीं, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों की योजना बनाने वाले परिवारों के लिए स्थानीय पंचांग के अनुसार मुहूर्त की पुष्टि करना उपयोगी रहेगा।
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