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रासायनिक खेती छोड़ जैविक गेंदे की खेती से बदली किसान की तकदीर, सालाना 30 लाख रुपये से अधिक का कारोबार!

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सीकर के किसान सुरेंद्र कुमार ने अपनाई जैविक खेती की राह, ड्रिप सिंचाई और फूलों की खेती से बढ़ाई आमदनी; अन्य किसानों के लिए बने प्रेरणा स्रोत

हलधर किसान सीकर (राजस्थान)। खेती में लगातार बढ़ती लागत, रासायनिक खादों और कीटनाशकों के बढ़ते इस्तेमाल तथा मिट्टी की घटती उर्वरता के बीच राजस्थान के एक किसान ने खेती का ऐसा रास्ता अपनाया है, जो दूसरे किसानों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है। सीकर जिले के किसान सुरेंद्र कुमार ने परंपरागत रासायनिक खेती को छोड़कर जैविक खेती की ओर कदम बढ़ाया और गेंदे के फूलों की खेती को अपनी आय का महत्वपूर्ण जरिया बनाया। आज वे विभिन्न फसलों और फूलों की खेती के माध्यम से सालाना 30 लाख रुपये से अधिक का कारोबार कर रहे हैं।

सुरेंद्र कुमार का यह सफर केवल खेती का तरीका बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बताता है कि किसान यदि अपनी जमीन, पानी और बाजार की मांग को ध्यान में रखकर फसल विविधीकरण अपनाएं, तो खेती को अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है।

10 साल से कर रहे हैं खेती, चार साल पहले बदला नजरिया

सुरेंद्र कुमार पिछले करीब 10 वर्षों से खेती-किसानी से जुड़े हुए हैं। खेती की शुरुआत उन्होंने सामान्य किसानों की तरह परंपरागत तरीके से की थी। उस समय फसलों में उत्पादन बढ़ाने के लिए रासायनिक खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन लगातार इनके उपयोग के कारण उन्हें खेत की मिट्टी की सेहत को लेकर चिंता होने लगी।

उन्होंने महसूस किया कि खेती में केवल तत्काल उत्पादन बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि जमीन की उर्वरता और प्राकृतिक संसाधनों को बचाना भी उतना ही जरूरी है। इसी सोच के साथ करीब चार साल पहले उन्होंने धीरे-धीरे रासायनिक खेती से दूरी बनानी शुरू की और जैविक खेती को अपनाने का निर्णय लिया।

इसके बाद उन्होंने खेतों में जैविक उत्पादों का इस्तेमाल शुरू किया। खेती की प्रक्रिया में बदलाव करते हुए उन्होंने मिट्टी की सेहत को प्राथमिकता दी और फसल उत्पादन के लिए प्राकृतिक तरीकों पर ध्यान देना शुरू किया।

ड्रिप सिंचाई से आधी रह गई पानी की जरूरत

सुरेंद्र कुमार ने जैविक खेती के साथ आधुनिक सिंचाई तकनीक को भी अपनाया है। उन्होंने अपने खेत में ड्रिप सिंचाई पद्धति लगाई, जिससे पानी का बेहतर उपयोग होने लगा।

उनके अनुसार, पहले खेतों में हर दूसरे दिन सिंचाई करनी पड़ती थी, लेकिन ड्रिप पद्धति अपनाने के बाद अब लगभग हर चौथे दिन सिंचाई की जरूरत पड़ती है। इससे पानी की खपत में करीब 50 प्रतिशत तक कमी आई है।

राजस्थान जैसे प्रदेश में जहां कई क्षेत्रों में किसानों को सिंचाई के लिए पानी की कमी का सामना करना पड़ता है, वहां ड्रिप सिंचाई जैसी तकनीक काफी उपयोगी साबित हो सकती है। इस पद्धति में पौधों की जड़ों तक बूंद-बूंद पानी पहुंचाया जाता है, जिससे पानी की बर्बादी कम करने में मदद मिलती है।

एक हेक्टेयर में गेंदे की खेती, छह महीने तक मिलते हैं फूल

सुरेंद्र कुमार के पास कुल चार हेक्टेयर कृषि भूमि है। इसमें से एक हेक्टेयर क्षेत्र में वे जैविक तरीके से गेंदे के फूलों की खेती करते हैं। शेष जमीन पर मूंग, मूंगफली, बाजरा और ग्वार जैसी पारंपरिक फसलें उगाते हैं। इसके अलावा सर्दियों के मौसम में गुलदाउदी जैसे फूलों की खेती भी करते हैं।

उनकी खेती की खास बात यह है कि वे केवल अनाज और दलहनी फसलों पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि फूलों की खेती को भी कृषि व्यवसाय का महत्वपूर्ण हिस्सा बना चुके हैं।

सुरेंद्र कुमार के अनुसार, गेंदे की बुवाई मुख्य रूप से मई और अक्टूबर महीने में की जाती है। इसके बाद पौधों से लगभग छह महीने तक फूल प्राप्त होते रहते हैं। इस तरह लंबे समय तक फूलों की उपलब्धता बनी रहती है और किसान को बाजार में बिक्री के अवसर मिलते हैं।

सीकर और जयपुर की मंडियों में पहुंचते हैं फूल

गेंदे के फूलों की मांग धार्मिक आयोजनों, पूजा-पाठ, शादी-विवाह, सामाजिक कार्यक्रमों और त्योहारों के दौरान अधिक रहती है। इसी बाजार मांग को ध्यान में रखते हुए सुरेंद्र कुमार अपने खेतों में फूलों का उत्पादन करते हैं।

उनके खेतों से निकलने वाले फूल रोजाना सीकर और जयपुर की मंडियों में बेचे जाते हैं। मंडियों में फूलों के भाव मांग, आपूर्ति, मौसम और त्योहारों के अनुसार बदलते रहते हैं। दीपावली, नवरात्रि और अन्य धार्मिक अवसरों पर फूलों की मांग बढ़ने से किसानों को बेहतर भाव मिलने की संभावना रहती है।

फूलों की खेती का एक बड़ा फायदा यह भी है कि किसान पारंपरिक फसलों के अलावा नकदी आय का एक अतिरिक्त स्रोत विकसित कर सकता है। हालांकि, इसमें बाजार भाव, फूलों की गुणवत्ता, परिवहन और बिक्री व्यवस्था का विशेष ध्यान रखना जरूरी है।

सभी फसलों को मिलाकर 30 लाख रुपये से अधिक का कारोबार

सुरेंद्र कुमार की खेती की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि उनका सालाना कारोबार है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वे गेंदे के फूलों सहित मूंग, मूंगफली, बाजरा, ग्वार और अन्य फूलों की खेती से सालाना 30 लाख रुपये से अधिक का कुल टर्नओवर कर रहे हैं।

यहां यह समझना जरूरी है कि 30 लाख रुपये से अधिक का आंकड़ा कुल कारोबार यानी बिक्री से जुड़ा है, इसे शुद्ध मुनाफा नहीं माना जाना चाहिए। खेती में बीज, जैविक उत्पाद, मजदूरी, सिंचाई, परिवहन और अन्य खर्च भी शामिल होते हैं। गेंदे की खेती से होने वाली वास्तविक शुद्ध कमाई का विस्तृत लागत और बिक्री विवरण उपलब्ध नहीं है।

किसानों के लिए क्या है सीख?

सुरेंद्र कुमार का अनुभव बताता है कि बदलते समय में खेती को लाभकारी बनाने के लिए केवल एक फसल पर निर्भर रहना जरूरी नहीं है। किसान अपनी जमीन और स्थानीय बाजार की मांग के अनुसार पारंपरिक फसलों के साथ फूलों, सब्जियों और अन्य नकदी फसलों को भी शामिल कर सकते हैं।

इसके साथ ही ड्रिप सिंचाई जैसी तकनीक अपनाकर पानी की बचत की जा सकती है और मिट्टी की सेहत को ध्यान में रखते हुए जैविक खेती की दिशा में कदम बढ़ाए जा सकते हैं।

हालांकि, जैविक खेती अपनाने से पहले किसानों को अपने क्षेत्र की जलवायु, मिट्टी, बाजार, उत्पादन लागत और जैविक प्रमाणीकरण जैसी जरूरतों की जानकारी अवश्य लेनी चाहिए।

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