Headlines

बीज कानून पाठशाला – 42 “साथी पॉर्टल- बीज गुणवत्ता में सुधार का भ्रम”

हमसे जुड़ेंलिंक कॉपी हुआ ✓

बीज प्रमाणीकरण, खेत निरीक्षण, प्रयोगशालाओं की मान्यता और सीलिंग व्यवस्था पर गंभीर सवाल; कृषि विभाग से व्यापारियों को अनावश्यक परेशान नहीं करने की अपील

हलधर किसान | विशेष रिपोर्ट | केंद्र सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा बीज प्रमाणीकरण प्रक्रिया में एकरूपता, पारदर्शिता और निगरानी बढ़ाने के उद्देश्य से लागू किए जा रहे ‘साथी पोर्टल’ को लेकर कृषि क्षेत्र में नई बहस शुरू हो गई है। कृषि आदान व्यापारियों का कहना है कि बीज की गुणवत्ता सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है, लेकिन किसी भी नई व्यवस्था को लागू करने से पहले उसकी तकनीकी, व्यावहारिक और कानूनी खामियों का समाधान किया जाना भी उतना ही जरूरी है। व्यापारियों ने मांग की है कि पोर्टल को पूरी तरह लागू करने से पहले इसकी व्यवस्थाओं की समीक्षा की जाए, ताकि बीज उत्पादकों, वितरकों और विक्रेताओं को अनावश्यक परेशानियों का सामना न करना पड़े।

इस विषय पर नेशनल सीड्स कॉर्पोरेशन से सेवानिवृत्त एरिया मैनेजर एवं बीज कानून विशेषज्ञ आर.बी. सिंह ने अपने विस्तृत तकनीकी विश्लेषण में साथी पोर्टल की कार्यप्रणाली और मौजूदा बीज प्रमाणीकरण व्यवस्था से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं। उनके विश्लेषण का मुख्य आधार यह है कि केवल डिजिटल रिकॉर्ड, ऑनलाइन ट्रैकिंग और पोर्टल पर जानकारी उपलब्ध करा देने से बीज की वास्तविक गुणवत्ता की गारंटी नहीं मिल सकती। इसके लिए खेत से लेकर प्रसंस्करण, परीक्षण और पैकेजिंग तक प्रत्येक स्तर पर प्रभावी निगरानी आवश्यक है।

बीज गुणवत्ता के लिए मौजूदा कानून और प्रमाणीकरण व्यवस्था

विश्लेषण में बताया गया है कि भारत में बीज की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए बीज अधिनियम 1966, बीज नियम 1968, बीज नियंत्रण आदेश 1983 और भारतीय न्यूनतम बीज प्रमाणीकरण मानक 2013 सहित विभिन्न व्यवस्थाएं बनाई गई हैं। बीज प्रमाणीकरण की जिम्मेदारी राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्थाओं पर है। दस्तावेज के अनुसार देश में लगभग 25 राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्थाएं कार्यरत हैं, जिनमें 17 स्वायत्त और 8 शासकीय नियंत्रण वाली संस्थाएं बताई गई हैं।

बीज प्रमाणीकरण की प्रक्रिया में खेत में खड़ी फसल का निरीक्षण महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रमाणीकरण अधिकारी फसल की किस्म और आनुवंशिक शुद्धता की जांच करते हैं। इसके बाद निर्धारित मानकों के आधार पर प्रमाणपत्र जारी किया जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि खेतों का वास्तविक निरीक्षण ही पर्याप्त रूप से नहीं हो रहा है, तो केवल पोर्टल पर दर्ज जानकारी से बीज की गुणवत्ता कैसे सुनिश्चित होगी?

खेत निरीक्षण की क्षमता और वास्तविकता में अंतर

विश्लेषण का एक महत्वपूर्ण पक्ष खेत निरीक्षण की व्यावहारिक क्षमता है। इसमें भारतीय बीज प्रमाणीकरण कार्यप्रणाली के वर्ष 2021 के मैनुअल का उल्लेख करते हुए बताया गया है कि एक प्रमाणीकरण अधिकारी द्वारा प्रतिदिन अधिकतम 50 एकड़ तक निरीक्षण की व्यवस्था का संदर्भ दिया गया है। वार्षिक आधार पर यह लगभग 1,000 एकड़ बैठता है।

इसके विपरीत, दस्तावेज में आरटीआई से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर विभिन्न राज्यों में निरीक्षण किए गए क्षेत्र का उल्लेख है। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश में वर्ष 2023-24 में 28,548 एकड़ और 2024-25 में 27,985 एकड़ क्षेत्र के निरीक्षण की जानकारी दी गई है। पंजाब में यह आंकड़ा क्रमशः 18,400 और 19,711 एकड़ बताया गया है। ऐसे आंकड़ों के आधार पर निरीक्षण अधिकारियों की वास्तविक क्षमता, समय और कार्यभार को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

विश्लेषण के अनुसार, जब निरीक्षण की व्यावहारिक सीमाओं और वास्तविक कार्यभार में इतना अंतर दिखाई देता है, तो पोर्टल पर दर्ज निरीक्षण संबंधी जानकारियों की वास्तविकता सुनिश्चित करना आवश्यक हो जाता है।

टैग, सील और बीज की पहचान पर भी सवाल

बीज के पैकेट पर लगा टैग और प्रमाणीकरण संस्था की सील उसकी पहचान और प्रमाणिकता के महत्वपूर्ण आधार हैं। दस्तावेज में आरोप लगाया गया है कि कई स्थानों पर टैग के पीछे संबंधित प्रमाणीकरण अधिकारी के हस्ताक्षर की व्यवस्था का समुचित पालन नहीं हो रहा है। इससे गलत ब्रांडिंग और नकली बीज की आशंका बढ़ सकती है।

इसी तरह बीज की बोरियों पर निर्धारित सील लगाने की प्रक्रिया को भी महत्वपूर्ण बताया गया है। सवाल उठाया गया है कि यदि प्रमाणित बीज की पैकिंग पर निर्धारित सील और उसकी पुष्टि की व्यवस्था ही प्रभावी नहीं है, तो डिजिटल पोर्टल किस प्रकार गुणवत्ता की पूरी जिम्मेदारी सुनिश्चित कर पाएगा?

प्रयोगशालाओं की मान्यता और परीक्षण प्रक्रिया

बीज की गुणवत्ता जांच में प्रयोगशालाओं की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। विश्लेषण में विभिन्न राज्यों की बीज परीक्षण प्रयोगशालाओं और बीज निरीक्षकों की अधिसूचना तथा मान्यता को लेकर सवाल उठाए गए हैं। इसमें कहा गया है कि केवल किसी प्रयोगशाला का नाम पोर्टल पर दर्ज होने से उसकी कानूनी वैधता और परीक्षण की विश्वसनीयता स्वतः प्रमाणित नहीं हो जाती। प्रयोगशालाओं की मान्यता, परीक्षण करने वाले अधिकारियों की पात्रता और रिपोर्ट की वैधानिक स्थिति स्पष्ट होना आवश्यक है।

इसके अतिरिक्त ग्रो-आउट टेस्ट (GOT), बीज के मूल स्रोत की जांच, लॉट नंबर की पहचान, प्रसंस्करण इकाइयों का निरीक्षण और प्रमाणीकरण प्रक्रिया पूरी होने के बाद जारी किए जाने वाले दस्तावेजों पर भी तकनीकी प्रश्न उठाए गए हैं।

केवल पोर्टल नहीं, जमीनी व्यवस्था में भी हो सुधार

विश्लेषण में स्पष्ट किया गया है कि बीज की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए डिजिटल व्यवस्था के साथ-साथ खेतों का वास्तविक निरीक्षण, बीज के स्रोत का सत्यापन, सही लॉट निर्माण, प्रयोगशालाओं की वैधानिक मान्यता, सील एवं टैग की पुष्टि और प्रसंस्करण इकाइयों की निगरानी आवश्यक है। यदि इन बुनियादी व्यवस्थाओं में कमियां बनी रहती हैं, तो केवल ऑनलाइन ट्रैकिंग से अपेक्षित परिणाम प्राप्त करना कठिन होगा।

इसलिए साथी पोर्टल को लागू करने से पहले सभी संबंधित पक्षों की आपत्तियों और सुझावों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। खासतौर पर बीज व्यापारियों को नई प्रक्रिया समझने, उसका प्रशिक्षण लेने और नियमों का सही तरीके से पालन करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए।

कृषि आदान व्यापारियों ने कृषि विभाग से की हस्तक्षेप की मांग

साथी पोर्टल को लेकर कृषि आदान व्यापारियों के संगठन ने भी केंद्र और प्रदेश सरकार के कृषि विभाग से मामले में हस्तक्षेप करने की अपील की है। संगठन के पदाधिकारियों का कहना है कि किसी भी नए नियम को लागू करने से पहले उसके सभी पहलुओं का परीक्षण किया जाना चाहिए। व्यापारियों को नियमों की पूरी जानकारी और उनके पालन की प्रक्रिया समझाए बिना कार्रवाई करना उचित नहीं होगा।

इस संबंध में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं प्रदेश अध्यक्ष मान सिंह राजपूत, राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं प्रदेश सचिव संजय रघुवंशी, प्रदेश उपाध्यक्ष श्रीकृष्ण दुबे, लीगल एडवाइजर राजेश मलैया, बैतूल जिला अध्यक्ष प्रकाश जैन तथा प्रदेश सदस्यता अभियान प्रभारी विनोद जैन सहित अन्य पदाधिकारियों ने कृषि विभाग के डायरेक्टर ऑफ एग्रीकल्चर एवं कृषि सचिव से अपील की है कि साथी पोर्टल की कमियों का बारीकी से निरीक्षण कर आवश्यक सुधार किए जाएं।

संगठन ने स्पष्ट किया है कि कृषि आदान व्यापारी बीज की गुणवत्ता और किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराने के पक्षधर हैं, लेकिन नई व्यवस्था की व्यावहारिक कठिनाइयों को दूर किए बिना इसे लागू करने से व्यापारियों के सामने अनावश्यक कानूनी और प्रशासनिक परेशानियां खड़ी हो सकती हैं।

यह भी पढे़:- बीज कानून पाठशाला – 41 “मूंगफली बीज के G.O.T. परिणाम अवैध”

सेवानिवृत्त आर.बी. सिंह 1 300x169 1

”बीज निरीक्षक की अधिनायक वादी प्रवृति“ आर.बी. सिंह, बीज कानून रत्न, एरिया मैनेजर (सेवानिवृत) नेशनल सीड्स
कारपोरेशन लि॰ (भारत सरकार का संस्थान) सम्प्रति – ”कला निकेतन“, ई-70, विथिका-11, जवाहर नगर, हिसार-125001 (हरियाणा), दूरभाष सम्पर्क-79883-04770, 94667-46625

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *