सरकार के नए विधयेक पर बीज कानून रत्न से सम्मानित आरबी सिंह ने आपत्ति के साथ दिए सुझाव

Seed Law Ratna Awardee RB Singh expressed his objections and suggestions regarding the governments new bill

हलधर किसान. इंदौर/ नई दिल्ली। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने बीज विधेयक 2025 का ड्राफ्ट जारी किया है। प्रस्तावित विधेयक मौजूदा बीज अधिनियम, 1966 और बीज (नियंत्रण) आदेश, 1983 का स्थान लेगा। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग की तरफ से जारी ड्राफ्ट में बाजार में उपलब्ध बीजों और रोपण सामग्री की गुणवत्ता सुनिश्चित करने, किसानों को किफायती दरों पर अच्छे बीज उपलब्ध कराने, नकली और घटिया बीजों की बिक्री पर अंकुश लगाने, नवाचार को बढ़ावा देने, बीज की वैश्विक किस्मों को किसानों तक पहुंचाने के लिए बीज आयात को उदार बनाने और बीज आपूर्ति श्रृंखलाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही लाने का प्रस्ताव है।
ड्राफ्ट बिल में छोटे श्रेणी के अपराधों को अपराधमुक्त किया जाना प्रस्तावित है, जिससे व्यापार सुगमता को बढ़ावा मिले और अनुपालन का बोझ कम हो। हालांकि इसके साथ ही अपराध के गंभीर उल्लंघन पर दंड के कड़े प्रावधान रखे गए हैं। सभी हितधारकों से ड्राफ्ट के प्रावधानों पर 11 दिसंबर 2025 तक सुझाव मांगे गए हैं।
इस नए विधेयक पर बीज कानून रत्न से सम्मानित प्रख्यात बीज कानूनों के जानकार आरबी सिंह ने केंद्र सरकार के इस विधेयक पर न केवल आपत्तियां दर्ज कराई है, बल्कि कई महत्वपुर्ण सुझाव भी दिए है।
आईये जानते है क्या है आपत्ति और सुझाव

संयुक्त सचिव बीज, भारत सरकार, कृषि एवं कृषक कल्याण, कृषि भवन, नई दिल्ली–

-निवेदन है कि बीज खेती किसानी का आधार है और इसीलिये बीज उत्तम गुणवत्ता का होना जरूरी है। भारत सरकार ने बीज की गुणवत्ता उच्चतर रखने के लिये बीज अधिनियम 1966 बनाया जो लगभग 59 वर्ष की आयु पूरी कर चुका है तथा इस काल खण्ड में बीज उद्योग एवं कृषि में अनेकों परिवर्तन आये जिसके कारण बीज अधिनियम 1966 के प्रावधान अप्रासांगिक लगने लगे तथा भारत सरकार ने सीड बिल 2000, 2002, 2004, 2010, 2015, 2019 और अन्ततः बीज विधेयक-2025 जारी किया और बीज उद्योग एवं बीज अधिनियम के हित अभिलाषियों से सुझाव मांगे। मैं इस क्रम में अपनी आपत्तियाँ और सुझाव निम्न बिन्दुवार प्रस्तुत कर रहा हूँ :-

1. ट्रेसिबिलिटी पोर्टल बन्द करें :- बीज गुणवत्ता भौतिक एवं अनुवांशिक होती है। किस्म की उत्पादकता उसकी अनुवांशिक शुद्धता पर आधारित होती है। बीज प्रमाणीकरण विद्या में राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्थाओं के बीज प्रमाणीकरण अधिकारी खड़ी फसल का निरीक्षण कर उसकी अनुवांशिक शुद्धता की जाँच करते हैं। ट्रेसिबिलिटी पोर्टल में सब अवयवों का समावेश कर इसे गुणवत्ता का श्रेष्ठ साधन मान लिया गया है परन्तु बीज प्रमाणीकरण अधिकारी कब खेत में घुसा और कब निरीक्षण कर निकला कोई उल्लेख नहीं है। महाराष्ट्र राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्था को छोड़ कर बहुतों के पास इतना स्टाफ ही नहीं है मैंने जन सूचना अधिकार अधिनियम के आधार पर सूचनाएं एकत्र की हैं और एक बीज प्रमाणीकरण अधिकारी एक साल में 5 से 10 हजार एकड़ का निरीक्षण करता है यह मात्र औपचारिकता (Formality) है और बीज की अनुवांशिक शुद्धता में कोई सुधार नहीं होगा। बीज प्रमाणीकरण अधिकारियों के निरीक्षण के मान दण्ड निम्न प्रकार हैं :-

(a) भारत सरकार द्वारा रचित Indian Seed Certification Working Manual 2021 के अध्याय-5 Field Inspection के बिन्दु 5.1.5 पृष्ठ संख्या 16 में प्रति बीज प्रमाणीकरण अधिकारी 50 एकड़ /प्रतिदिन / प्रति SCO का आधार है जबकि ये 400-500 एकड़ एरिया एक दिन में निरीक्षण करते हैं।

(b) भारत सरकार की Report of the Expert group on Seed जून 1989 के नवें अध्याय Quality Control के बिन्दु 9.34 में 400 हैक्टेयर क्षेत्रफल प्रति SCO की सालाना शर्त है।

(c) रोकफैलर फाउन्डेशन के Seed Production Specialist Johnson E. Douglas ने Seed Certification Manual में शीर्षक Administration and Inspection के अन्तर्गत एक बीज प्रमाणीकरण अधिकारी के खेत निरीक्षण 500-1000 एकड़ प्रति वर्ष का उल्लेख है।

(d) नेशनल सीड्स कारपोरेशन के वरिष्ठ प्रबन्धक डॉ० एन.पी. नीमा की पुस्तक Principles of Seed Certification & Testing के अध्याय-II Seed Certification के शीर्षक STAFF Requirement के अन्तर्गत पृष्ठ 27 पर बताया है कि अधिकतम 400 हैक्टेयर क्षेत्रफल निरीक्षण का वार्षिक आधार है।

निरीक्षण नोर्मस के अनुसार नहीं है अतः रिपोर्ट बनाना औपचारिकता है निरीक्षण नहीं होते हैं अतः Traceability बन्द कर दी जाए। इसमें और भी कमियाँ हैं। यह केवल बीज उत्पादकों को निरुत्साहित करने का साधन मात्र है।

2. स्वयं प्रमाणीकरण का प्रावधान किया जाए :- इन तथाकथित राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्थाओं के पास पर्याप्त स्टाफ ही नहीं है अतः प्रमाणीकरण एक छलावा है। बीज विधेयक-2025 में स्वयं बीज प्रमाणीकरण का प्रावधान किया जाए और सभी के लिये नहीं तो जिनके पास संस्थागत ढांचा (Infrastructure) तथा दक्ष स्टाफ है उन्हें स्वयं प्रमाणीकरण के अधिकार दिये जाएं क्योंकि :-

(a) विदेशों में स्वयं बीज प्रमाणीकरण की पद्धति है और भारत पिछले 60 वर्षों से बीज गुणवत्ता दक्ष हो गया है।

(b) New Seed Policy 2002 (Libralization Policy) के शीर्षक Quality Assurance के बिन्दु 3.6.1 में स्वयं प्रमाणीकरण का प्रावधान किया हुआ है।

(c) बीज विधेयक 2000, की धारा 19 में तथा 2002, 2004, 2010 के विधेयकों में स्वयं बीज प्रमाणीकरण का प्रावधान था परन्तु बीज विधेयक 2019 तथा 2025 में लोप कर दिया गया।

3. बीज विक्रय लाइसैंस अनन्त काल तक :- नये बीज अधिनियम 2025 के अनुसार बीज उत्पादक कम्पनी, बीज विधायन ईकाई, बीज विक्रेता, बीज वितरक का पंजीकरण होना आवश्यक है अतः कीटनाशी अधिनियम 1968 की तरह अनन्त काल का बनाया जाए और स्थानान्तरणीय (Transferable) हो। लाइसैंस लेने के लिए प्रिंसीपल प्रमाण-पत्र (पी.सी. P.C.) की शर्त न लगाई जाए।

4. अपीलीय प्राधिकरण बहुसदस्ययी हो :- (a) बीज विधेयक 2025 की धारा-28 में विधेयक की धारा-17 के द्वारा बीज उत्पादक एवं बीज उत्पादक ईकाई के पंजीकरण से सरकार से उपजे विरोध, धारा-18 में सरकार और अधिकृत विक्रेता तथा वितरक के मध्य उपजे विवाद तथा प्लान्ट नरसरी धारक तथा सरकार के मध्य या सैंट्रल सीड कमेटी एवं व्यापारियों के मध्य उपजे विवाद के लिये अपीलीय प्राधिकरण का गठन होगा जो एक सदस्ययी न होकर बहु सदस्ययी हो और उसमें एक प्राधिकारी राज्य सरकार तथा एक सदस्य बीज उत्पादकों का तथा एक बीज विक्रेता / वितरक वर्ग से प्रतिनिधि हो।

(b) अपील निर्धारण की समय सीमा :- अपीलीय प्राधिकरण में विवाद दायर करने का समय 30 दिन है परन्तु अपीलीय प्राधिकारी द्वारा निर्णय की समय सीमा नहीं है अतः एक माह में प्राधिकारी निर्णय दे क्योंकि मध्य प्रदेश में अपील पर निर्णय 2, 2.5 साल तक भी नहीं देते हैं।

(c) राज्य बीज प्रमाणीकरण के विरूद्ध विवाद :- विधेयक में राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्था के निर्णयों से उपजे विवाद के लिये अपील का प्रावधान नहीं है जबकि बीज अधिनियम 1966 की धारा-11 में प्रावधान था। अतः प्रावधान किया जाए।

5. सेल स्टॉप ऑर्डर :- बीज अधिनियम 1966 की धारा-14 (1) (c) में बीज निरीक्षक को एक माह तक बीज विक्रय रोक लगाने का अधिकार था। इस विधेयक में धारा-32(1) (c) में बीज विक्रय रोक को 15 दिवस कर दिया है। बीज व्यवहारियों को तंग करने का एक सुन्दर बहाना है अतः यह 15 दिन की बीज बिक्री रोक समाप्त होनी चाहिए।

6. प्रमाणित बीज की सीड सैम्पलिंग न हो :- तथाकथित सीड ट्रेसिएबिलिटी में बीज उत्पादकों द्वारा संस्था और बीज के बारे दिल चीर कर सब कुछ जाहिर कर दिया जाता है और राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्था द्वारा प्रमाणित बीज की वैधता अवधि 9 माह तक पुनः बीज निरीक्षक सैम्पल न ले क्योंकि :-

(a) पंजाब राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्था ने 20.05.2025 को एक पत्र जारी किया है कि जब बीज के बारे सब विवरण Traceability Portal (Salhi) पर दिया है और प्रत्येक लॉट अधिसूचित लैब से टैस्ट करके जारी किया जाता है अतः दोबारा सैम्पल न लिया जाये।

(b) उच्च न्यायालय नागपुर भास्कर बडकल तन्नागी बनाम हिन्दुस्तान लिवर लिमिटेड (1987) तथा कर्नाटक राज्य बनाम एस.ए. जयनारायण 2003 के वाद में निर्णय दिये कि राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्था द्वारा लॉट का प्रमाण-पत्र बीज गुणवत्ता की गारंटी देता है और बीज गुणवत्ता का दायित्व बीज उत्पादक से राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्था पर स्थानान्तरित हो जाता है।

7. बीजोपचार सारणी की रचना :- बीज विधेयक 2025 में बीज स्वास्थ्य (Seed Health) पर अधिक जोर दिया जा रहा है परन्तु बीज अधिनियम-1966 के 59 साल की कालावधि में अधिसूचित / अधिकृत /मान्य बीजोपचार सारणी नहीं बन पाई है और केन्द्रीय बीज प्रमाणीकरण बोर्ड द्वारा सतत आर.टी.आई. के माध्यम से पूछने पर बार-2 एक ही उत्तर मिलता है शीघ्र बनायेंगे। वर्तमान में जो सारणी अनाधिकृत रूप से प्रयोग में लाई जा रही है वह भारतीय कृषि अनुसन्धान संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई तथा प्रमाणीकरण के प्रारम्भिक काल में नेशनल सीड्स कारपोरेशन द्वारा अपनाई गई और इस सारणी के अनुसार उपचार कभी भी किसी भी उच्च न्यायालय / उच्चतम न्यायालय में चुनौती मिल सकती है अतः बीजोपचार सारणी अवश्य बनाई जाए या IARI की सारणी को CSCB मान्यता दे और अधिसूचित की जाए ।

8. एडज्यूडिकेटिड अफसर के विरूद्ध अपील :- भारत सरकार अपराध के निर्धारण एवं निर्णय देने के लिये अधिकृत एडज्यूडिकेटिंग प्राधिकरण (Adjudicating Authority) निर्णय देगा और काई प्रकरण न्यायालय में नहीं जायेगा जब तक बीज निरीक्षक न चाहे अतः एडज्यूकेटिंग प्राधिकरण (Adjudicating Authority) के विरूद्ध न्यायालय में चुनौती देने का प्रावधान नैसर्गिक न्याय (Natural Justice) के विरूद्ध है। अतः आवश्यक प्रावधान होना चाहिए।

9. दण्डात्मक प्रावधान :- बीज विधेयक-2025 की धारा-34 में बीज अधिनियम ने घटित अपराध के प्रति दण्डात्मक प्रावधान दिये गये हैं और उनका निर्णय Adjudicating Authority द्वारा किया जायेगा। बीज व्यवहारी Seed Trader तथा बीज उत्पादक को न्यायालय जाने का अधिकार भी नहीं होगा अतः विवादों का निर्णय भारत की Cr.P.C. अपराध संहिता से हो अन्यथा विभाग ही दोष लगाएगा और वही निर्णय देगा अर्थात विभाग परीक्षार्थी एवं परिक्षक (Examinee & Examiner) दोनों होगा तथा विभाग का अधिनायक वाद बढ़ेगा। जो भारतीय बीज उद्योग के लिए लाभकारी नहीं होगा।

10. दण्ड का आकार :- बीज विधेयक-2025 की धारा-34 (1) में Trival Offence तुच्छ अपराध के लिये स्पष्टीकरण मांग कर गलती का सुधार करने पर छोड़ दिया जाए और पुनः करने पर चेतावनी दी जाए। धारा-34(2) में छोटे अपराध (Miner Offence) के लिये 25000/- रुपये अर्थ दण्ड तथा धारा-34(3) के अनुसार अधिकतम दण्ड 3 लाख रुपये निश्चित किया जाये प्रथम द्वितीय एवं तृतीय अपराध घटन के साथ दण्डात्मक राशि बढ़ाने का प्रावधान हटाया जाए।

11. किस्मों का पंजीकरण :- बीज अधिनियम 1966 की धारा-5 के अन्तर्गत नोटिफाईड किस्में स्वतः पंजीकृत मानी जायेगी तथा नई किस्मों का बीज विधेयक में दी गई विधि द्वारा पंजीकरण होगा परन्तु वर्तमान में निजी क्षेत्र की रिसर्च किस्मों को किस्म विकसित करने वाली कम्पनी संस्था द्वारा उपलब्ध बहुस्थलीय परिक्षण (Multilocational Trial) के दो साल के Data के आधार पर पंजीकृत की जाएगी। अतः बाजार में रातोंरात बन कर तैयार होने वाली किस्मों की भरमार रूकेगी।

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12. फारमर किस्म का पंजीकरण अनिवार्य हो :- बीज विधेयक-2025 की धारा-2 (25) के बिन्दु-III में फारमर्स किस्म, किस्म की परिभाषा में दी गई है परन्तु पंजीकरण में फारमर्स किस्म के पंजीकरण का उल्लेख नहीं है बीज विधेयक-2019 में फारमर्स किस्में को पंजीकरण से छूट दी गई थी। Farmers Variety को पंजीकरण से छूट न दी जाए अन्यथा अधिकतर बीज उत्पादक जिनके पास कृषि योग्य भूमि है Farmers Variety विकसित करेंगे और अपने Brand नाम से बेच सकेंगे तथा पुनः घल्लू-घारा होगा और रोज नई तथाकथित किस्में बाजार में होंगी।

14. बीज निरीक्षक भी वाजबदेह हो :- बीज विधेयक-1966 और बीज विधेयक-2025 बीज की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए है और बीज कारोबोरियों को अधिनियम के उलंघन के लिये सख्त सजा दी जाए। बीज की गुणवत्ता बनाए रखने का जिम्मा बीज निरीक्षक पर है परन्तु अनुभव किया है बीज निरीक्षक बीज गुणवत्ता बनाए रखने के बहाने ऐसे कदम उठाते हैं जो बीज अधिनियम के दायरे से बारह हैं कुछ का उल्लेख निम्न प्रकार है :-

(a) बीज विक्रय के लिये अनुमति (Permission) / पंजीकरण ।

(b) दूसरे राज्य के विक्रेता को राज्य में लाइसैंस लेने के लिये बाध्य करना।

(c) टोलरेंस का लाभ न देना।

(d) प्रिंसीपल सर्टिफिकेट (P.C.) की मांग।

(e) टी.एल. सीड (लेबल्ड सीड) विक्रय बन्द कराना।

(f) बीज विक्रय लाइसैंस के लिये शैक्षणिक योग्यता का प्रमाण लगाना।

(g) बीज विक्रय के लिये डिप्लोमा प्रमाण-पत्र देना।

(h) मूंगफली का गिरी (Kernel) के रूप में अबध प्रमाणीकरण एवं प्रत्येक राज्य में विक्रय।

(i) गैर अधिसूचित बीज विश्लेषकों तथा गैर अधिसूचित बीज परीक्षणशालाओं के परिणामों के आधार पर बीज प्रमाणीकरण कराना।

(j) ढेंचा का ढेचा बीज कह कर सरकार द्वारा विक्रय।

ऐसी रोजाना अनेक फरमान जारी होते हैं जो बीज निरीक्षक के बीज विधायी ज्ञान के अभाव से पनपते हैं या उनके बीज कानून की अपनी तरह विवेचना करने से पनपते हैं। अतः इस प्रकार के प्रकरण में बीज निरीक्षक को जिम्मेदार ठहराया जाए एवं दण्ड दिया जाए।

15. केन्द्र द्वारा बीज कानूनों की राज्य द्वारा पालना की अर्ध वार्षिक समीक्षा :- बीज अधिनियम केन्द्र का कानून है और पालना राज्य सरकारों को करनी होती है। प्रत्येक राज्य सरकार के कृषि अधिकारी बीज कानून की धाराओं की विवेचना अपने अनुसार करते हैं अतः केन्द्र सरकार राज्य सरकारों से फीडबैक लेकर छः माह में एक बार राज्यों के कृषि निदेशकों से मन्त्रणा कर कानून लागू करने में एकरूपता लाए अन्यथा बीज कानून के अविधिक पालन से बीज व्यापार प्रभावित होता है।

16. छूट :- प्रस्तुत बीज विधेयक-2025 की धारा-60 में किसी भी वर्ग को बीज अधिनियम की पालना से छूट नहीं दी गई है अतः यह लाजमी हो जाता है कि कृषि विश्वविद्यालय और शासकीय संरक्षण में कार्यरत संस्थाएं जनक वर्ग Breeder Class का बीज विक्रय करती है उन्हें भी डीलर पंजीकृत होना होगा। इन कृषि विश्वविद्यालयों तथा शासकीय संस्थाओं द्वारा विकसित किस्मों को MOA के तहत ऊँची दरों पर विक्रय पर रोक लगनी चाहिए और भारत सरकार को इन किस्मों की कीमत पर नियन्त्रण रखना चाहिए।

17. बीज कोष की स्थापना :- प्रस्तावित कीटनाशी मैनेजमैन्ट 2020 जो कीटनाशी अधिनियम 1968 को हटाने के लिये लाया जा रहा है उसमें एक कीटनाशी कोष बनाने का प्रावधान है जिसके द्वारा कीटनाशी के दुष्प्रभावों से होने वाली मौतों को रोका जा सके एवं प्रभावित किसानों के पुनर्जत्थान के लिये आर्थिक सहायता दी जा सके। इसके लिए भारत सरकार प्रारम्भ में एक मुशत धनराशि देगी और शेष कीटनाशी कम्पनियों से सतत धन मिलता रहे। इसी प्रकार राष्ट्रीय बीज कोष की स्थापना की जाए और उससे ऐसे बीज व्यापारियों को मद्द दी जाए जो किसी कारण अपने व्यवसाय में असफल हो गये। किसानों की फसल क्षति पूर्ति का कोई प्रावधान किया जाए।

18. सरकारी निगमें टी. एल. बीज न खरीदें :- राज्य सरकारों को कभी-2 मिनिकिट देने के लिये या अन्य किसी कारण से निजी संस्थाओं या राष्ट्रीय संस्थाओं से बीज खरीदना पड़ता है अतः भार सरकार ने अपने पत्र दिनांक 11.12.2024 के द्वारा आदेश जारी किये हैं कि सरकारी निगमें टी. एल. वर्ग का बीज न खरीद कर वितरित करे जैसे हरियाणा में हर साल 70-72 हजार क्विंटल ढेंचा बीज के नाम पर ढेंचा जो बीज की परिभाषा भी पूरी नहीं करता खरीद कर वितरित किया जाता है साथ ही आदेश दिए हैं कि मांग 3 वर्ष पूर्व दी जाए। ये आदेश जारी तो कर दिये और सुहावने लगते हैं परन्तु धरातल पर पालन नहीं हो रहा। अधिनियम के द्वारा प्रावधान किया जाए कि टी.एल. बीज खरीद कर वितरित न किया जाए।

19. कम्प्युटराईजड रिकॉर्ड को मान्यता :- अन्य उद्योगों की तरह बीज उद्योग में बीज व्यापार का कम्प्यूटर में बनाए गये रिकॉर्ड को सरकार मान्यता दे और इस अधिनियम में यथा उल्लेख करें।

20. राष्ट्रीय बीज दिवस :- बीज उद्योग को बढ़ावा देने के लिये अन्य विषयों की तरह राष्ट्रीय बीज दिवस भी घोषित किया जाए। बेहतर हो यह 19 मार्च 1963 के दिन हो।

इंदौर शहर के सीनियर बीज विक्रेता व जिला अध्यक्ष श्री कृष्णा दुबे के सुझाव

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हमारे देश के समस्त कृषि आदान व्यापारी साथियों यह जो नया बीज विधेयक 2025 लाया गया है किसके अंदर इतनी कठिन दंडात्मक जो है नियम दिए गए हैं और दंड की जो पेनल्टी है उसकी भी रकम इतनी अधिक है इतना तो भाई दूसरे व्यापार में यदि हम कहें कि मेडिकल लाइन में जहां जीवन रक्षक दवाइयां का बिक्री होती है वहां पर इस प्रकार के दंडात्मक कार्रवाई या इस प्रकार के जो है कठिन पेनल्टी के भुगतान की व्यवस्था नहीं है क्या सरकार को हम सिर्फ बीज विक्रेता बेईमानी से काम करने वाले व्यापारी दिख रहे हैं अरे हम लोगों के बदौलत ही पूरे देश में जो है भारत कृषि प्रधान प्देश जो कहलाता है उसका श्रेय हमारे देश के कृषि आदान व्यापारियों को भी जाता है कितने वर्षों से जो इस बीज व्यापार की लाइन में है और साल दर साल जो है किसानों को नई-नई किस्म की वैरियटयां देकर जो है उत्पादन बढ़ाने में सहयोग प्रदान कर रहे हैं इसके सामने यदि देखा जाए तो देश की सरकार के जो उपक्रम है जो बीज प्रमाणीकरण संस्थाएं हैं जो देश के अनेकों प्रदेशों में कार्यरत हैं उनके *कंपैरिजन में देखा जाए उनके सामने देखा जाए तो हम निजी कृषि *आदान व्यापारी जो है उनका सहयोग देश को कृषि प्रधान बनाने में अधिक से अधिक रहा है और रहेगा अभी इस प्रकार के जो नए बीज बिल 2025 विधेयक लाया गया है इसमें हम प्राइवेट सेक्टर के कृषि आदान व्यापारियों को तो समस्या होगी ही इसके साथ-साथ जो *सरकारी उपक्रम है जो पूरे देश में अलग-अलग राज्यों में सरकारी  जो है बीज प्रमाणीकरण संस्था है या बीज उत्पादक संस्था है उनके ऊपर भी इसका असर होगा तो सरकार ने उनके लिए क्या सोचा है सारे कानून सारे नियम सारे दंड तो हम निजी कृषि आदान  व्यापारियों के ऊपर है कभी आज तक इस प्रकार की सरकारी बीज प्रमाणीकरण संस्था या उपक्रम वालों को दंडित * किया गया है या उनको सजा दी गई है यदि आप कुछ नया नियम कानून बना रहे हैं तो सिक्के के दोनों पहलुओं को जो है गंभीरता से शांति से देखकर सोच कर समझ कर निर्णय लिया जाए और इस बीज विधेयक 2025 में उन चीजों के ऊपर भी नियंत्रित किया जाए जिसका देश के प्रदेश के जिले के कृषि विभाग के अधिकारी जो है गलत फायदा उठाते हैं और अनावश्यक दबाव बनाकर अवैध* वसूली करते हैं उसके लिए शासन की प्रशासन की कृषि मंत्रालय की विधेयक बनाने वाले माननीय सज्जनों की क्या तैयारी है इसके साथ-साथ ही जो  किसी भी राज्य का बीज प्रमाणीकरण संस्था का उनकी लैब से टेस्ट होकर आता है और उसके ऊपर टैग लगा रहता है उस पर सारी जानकारियां लिखी रहती है जो बीज अधिनियम के अंतर्गत आता है उसके बाद भी विभाग के लोग उस पैकेट में से उस बैग में से सैंपल लेते हैं और टेस्ट के लिए भेजते हैं क्या इसका मतलब यह समझे हम की अन्य राज्य से जो *यह बीज प्रमाणीकरण संस्था द्वारा प्रमाणित करके भेजा है उसका जिस राज्य की सरकार ने जिस राज्य के विभाग में जिस राज्य के कृषि विभाग के अधिकारियों ने सैंपल लिया है उनको जिस राज्य से यह बीज प्रमाणित होकर आया उसे पर भरोसा नहीं है क्यों भाई वह भी तो आपकी सरकार की संस्था है इस प्रकार की जो त्रुटियां हैं उनको गंभीरता से देखकर इसका निर्णय ले और यह बात कटु सत्य है जिस दिन हम निजी कृषि आदान  व्यापारी लोग इस लाइन से बाहर हो गए या आधे लोग भी बाहर निकल गए तो सरकार किसी कीमत पर पूरे देश के किसानों को उनकी आवश्यकता का बीज जो है सप्लाई करने में अक्षम रहेगी हम निजी क्षेत्र के जो व्यापारी है वही इस बीज व्यापार को जो है जिंदा रखे हुए हैं श्री कृष्णा दुबे अध्यक्ष जागरूक कृषि आदान विक्रेता संघ जिला इंदौर***

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