हलधर किसान | रतलाम। जिले की मंडियों में नई सोयाबीन की आवक धीरे-धीरे बढ़ने लगी है, लेकिन किसानों को उनकी उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) भी नहीं मिल पा रहा है। सरकार ने 2026-27 विपणन सीजन के लिए सोयाबीन का एमएसपी 5,708 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित किया है, जबकि रतलाम मंडी में नई सोयाबीन करीब 3,800 से 5,200 रुपए प्रति क्विंटल के भाव पर बिक रही है। वर्तमान में नई सोयाबीन का औसत भाव लगभग 5,000 रुपए प्रति क्विंटल बताया जा रहा है। इस तरह किसानों को एमएसपी की तुलना में करीब 700 रुपए प्रति क्विंटल कम दाम मिल रहा है।
नई फसल की कटाई शुरू होने के साथ ही किसान अपनी सोयाबीन लेकर मंडियों में पहुंच रहे हैं। हालांकि मंडी में मिलने वाले भाव और उत्पादन लागत के बीच अंतर ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। किसानों का कहना है कि फसल तैयार करने में बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरी, जुताई, निंदाई-गुड़ाई और कटाई-थ्रेशिंग सहित कई तरह के खर्च होते हैं। ऐसे में यदि उपज एमएसपी से भी नीचे बिकती है तो खेती की लागत निकालना मुश्किल हो जाता है।
एक बीघा में करीब 12,500 रुपए की लागत
किसानों के अनुसार एक बीघा सोयाबीन की खेती पर औसतन करीब 12,500 रुपए तक खर्च आता है। इसमें बुवाई पर करीब 600 रुपए, जुताई पर 400 रुपए, निंदाई-गुड़ाई पर 1,500 रुपए, बीज पर 1,500 रुपए, कीटनाशक पर 2,000 रुपए, खाद एवं उर्वरक पर 1,000 रुपए, मजदूरी पर 3,000 रुपए तथा थ्रेशिंग और ढुलाई पर करीब 2,500 रुपए का खर्च शामिल है।
यदि एक बीघा में औसतन 2.5 क्विंटल सोयाबीन का उत्पादन होता है और किसान को करीब 5,000 रुपए प्रति क्विंटल का भाव मिलता है, तो पूरी उपज बेचने पर करीब 12,500 रुपए ही प्राप्त होते हैं। यानी किसान की पूरी आमदनी खेती की अनुमानित लागत के बराबर रह जाती है। इसमें किसान की अपनी मेहनत, जमीन का मूल्य, सिंचाई या अन्य अप्रत्यक्ष खर्च शामिल किए जाएं तो वास्तविक आर्थिक स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
पिछले साल भावांतर से मिली थी राहत
पिछले वर्ष 2025 में भी सोयाबीन के भाव एमएसपी से नीचे चले गए थे। किसानों के विरोध और कम बाजार भाव की स्थिति के बाद सरकार ने भावांतर भुगतान योजना के तहत सोयाबीन की खरीदी की थी। इससे किसानों को बाजार भाव और निर्धारित मूल्य के बीच अंतर के आधार पर राहत मिली थी।
इस वर्ष नई सोयाबीन की मंडी आवक शुरू हो चुकी है, लेकिन अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि भावांतर योजना के तहत सोयाबीन की खरीदी होगी या नहीं। किसानों का कहना है कि जब तक सरकारी स्तर पर स्पष्ट निर्णय नहीं होता, तब तक उन्हें बाजार में उपलब्ध भाव पर ही उपज बेचनी पड़ रही है। किसानों की मांग है कि सरकार समय रहते खरीदी व्यवस्था और समर्थन मूल्य को लेकर स्पष्ट घोषणा करे, ताकि उन्हें मजबूरी में कम दाम पर अपनी उपज न बेचनी पड़े।
जिले में 2.90 लाख हेक्टेयर में सोयाबीन
रतलाम जिले में इस खरीफ सीजन में करीब 2.90 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सोयाबीन की बोवनी होने का अनुमान है। शुरुआती कटाई में कई क्षेत्रों में प्रति बीघा करीब ढाई से तीन क्विंटल तक उत्पादन सामने आ रहा है। इस आधार पर जिले में 7 लाख क्विंटल से अधिक सोयाबीन उत्पादन का अनुमान लगाया जा रहा है। हालांकि वास्तविक उत्पादन का आंकड़ा कटाई और थ्रेशिंग का काम पूरा होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
जिले में सोयाबीन किसानों की बड़ी संख्या होने के कारण मंडियों में आने वाले दिनों में आवक बढ़ने की संभावना है। यदि बाजार भाव में सुधार नहीं हुआ और सरकारी खरीदी को लेकर जल्द निर्णय नहीं लिया गया तो किसानों पर कम कीमत पर उपज बेचने का दबाव बढ़ सकता है।
किसान संगठन ने एमएसपी पर खरीदी की मांग उठाई
भारतीय किसान संघ के जिलाध्यक्ष ललित पलीवाल ने कहा कि किसानों को सोयाबीन का भाव एमएसपी के बराबर भी नहीं मिल रहा है। उनका कहना है कि सरकार को किसानों की स्थिति को देखते हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर तत्काल सरकारी उपार्जन केंद्र शुरू करने चाहिए।
पलीवाल के अनुसार, किसानों को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें उनकी उपज का उचित मूल्य सुनिश्चित हो। उन्होंने भावांतर भुगतान योजना को लेकर भी असंतोष जताते हुए कहा कि किसानों को सीधे उनकी उपज का उचित भाव मिलना चाहिए, केवल अंतर की भरपाई पर निर्भर व्यवस्था से किसानों की समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता।
नमी के कारण भी भाव पर असर
मंडी व्यापारियों के अनुसार नई सोयाबीन में फिलहाल नमी की मात्रा अधिक आ रही है। व्यापारी विमल जैन ने बताया कि नई फसल में नमी अधिक होने के कारण उसके भाव पर असर पड़ रहा है। आने वाले दिनों में जैसे-जैसे मंडियों में आवक बढ़ेगी, बाजार में कीमतों पर दबाव बढ़ने की संभावना भी बनी हुई है।
किसानों के सामने फिलहाल दोहरी चुनौती है। एक ओर नई सोयाबीन में नमी अधिक होने के कारण मंडी भाव प्रभावित हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर एमएसपी और बाजार भाव के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। ऐसे में किसानों की निगाह अब सरकार के अगले फैसले पर टिकी है।
किसानों की मांग है कि सोयाबीन की सरकारी खरीदी को लेकर जल्द स्थिति स्पष्ट की जाए और उन्हें एमएसपी के अनुरूप मूल्य सुनिश्चित करने की व्यवस्था की जाए। इससे किसानों को अपनी उपज मजबूरी में कम कीमत पर बेचने से राहत मिल सकती है और खरीफ फसल की लागत निकालने में मदद मिलेगी।
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