अजनार नदी की गंदगी देखकर प्रशासन का इंतजार नहीं किया, खुद शुरू किया सफाई अभियान; सोशल मीडिया पर हो रही जमकर तारीफ
ब्यावरा। नाम है बिट्टू तबाही, उम्र महज 20 वर्ष और पढ़ाई B.Sc की। लेकिन उनके नाम के उलट उनकी कोशिश तबाही फैलाने की नहीं, बल्कि एक नदी में फैली गंदगी की ‘तबाही’ को खत्म करने की है। मध्य प्रदेश के ब्यावरा में रहने वाले इस युवा छात्र ने अजनार नदी की बदहाल स्थिति देखी तो केवल शिकायत करने या प्रशासन का इंतजार करने के बजाय खुद नदी की सफाई का बीड़ा उठा लिया।
बिट्टू ने 26 जनवरी 2026 से अजनार नदी में सफाई अभियान शुरू किया। नदी में लंबे समय से जमा प्लास्टिक, पूजा सामग्री, कचरा और दूसरी गंदगी देखकर उन्होंने अकेले ही इसे साफ करने की शुरुआत की। शुरुआत में उनके पास न कोई बड़ी मशीन थी, न कोई विशेष टीम और न ही पर्याप्त सुरक्षा संसाधन। इसके बावजूद उन्होंने अपने स्तर पर नदी में उतरकर कचरा निकालना शुरू कर दिया।
तैरना नहीं आता, फिर भी नदी में उतरे
बिट्टू के अभियान की सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि उन्हें तैरना तक नहीं आता। इसके बावजूद उन्होंने नदी की सफाई के लिए गंदे पानी में उतरने का साहस दिखाया। शुरुआती दिनों में तो वह बिना ग्लव्स और सेफ्टी बूट्स जैसे सुरक्षा उपकरणों के ही सफाई करते रहे।
नदी में जमा कचरे के बीच काम करना आसान नहीं था। पानी में प्लास्टिक और पूजा सामग्री के अलावा कई तरह का कचरा मौजूद था। लगातार गंदे पानी के संपर्क में रहने के कारण बिट्टू के हाथों में संक्रमण भी हो गया। इसके बावजूद उन्होंने सफाई अभियान बंद नहीं किया।
उनका कहना था कि अगर हर व्यक्ति केवल यह सोचकर पीछे हट जाए कि सफाई करना किसी और की जिम्मेदारी है, तो समस्या कभी खत्म नहीं होगी। इसी सोच के साथ उन्होंने अपनी मुहिम को लगातार आगे बढ़ाया।
पूजा सामग्री से बना रहे कंपोस्ट
बिट्टू की पहल केवल नदी से कचरा निकालने तक सीमित नहीं है। उन्होंने नदी से निकलने वाली पूजा सामग्री को भी उपयोगी बनाने की कोशिश शुरू की है। पूजा सामग्री को अलग करके उससे कंपोस्ट तैयार करने का काम किया जा रहा है।
इससे एक ओर नदी में पूजा सामग्री के कारण होने वाले प्रदूषण को कम करने की कोशिश है, वहीं दूसरी ओर जैविक सामग्री को दोबारा उपयोग में लाने का प्रयास भी किया जा रहा है। यानी नदी की सफाई के साथ-साथ कचरे के बेहतर प्रबंधन की दिशा में भी बिट्टू काम कर रहे हैं।
दोस्तों को साथ जोड़ा, अपनी जेब से खर्च किए करीब 30 हजार रुपये
अकेले शुरू की गई इस मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए बिट्टू ने अपने दोस्तों को भी साथ जोड़ा। दोस्तों की मदद से पैसे जुटाकर डस्टबिन और सफाई से जुड़े जरूरी सामान खरीदे गए।
बताया गया है कि अब तक इस अभियान में बिट्टू अपनी जेब से करीब 30 हजार रुपये खर्च कर चुके हैं। एक छात्र के लिए इतनी राशि खर्च करना अपने आप में बड़ी बात है। खासकर तब, जब यह पूरा प्रयास किसी व्यक्तिगत आर्थिक लाभ के लिए नहीं बल्कि सार्वजनिक जगह और नदी की सफाई के लिए किया जा रहा हो।
धीरे-धीरे उनकी मुहिम का दायरा भी बढ़ता गया और लोगों का ध्यान इस ओर जाने लगा।
सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो
बिट्टू द्वारा अजनार नदी की सफाई करते हुए बनाए गए वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद उनकी पहल चर्चा में आ गई। वीडियो में उन्हें नदी के गंदे पानी और कचरे के बीच सफाई करते हुए देखा गया। इसके बाद बड़ी संख्या में लोगों ने उनके प्रयास की सराहना की।
सोशल मीडिया यूजर्स ने इसे युवाओं के लिए प्रेरणादायक पहल बताया। लोगों का कहना है कि जिस उम्र में अधिकांश युवा सोशल मीडिया पर अपना समय बिताते हैं, उस उम्र में बिट्टू सार्वजनिक हित से जुड़े काम में अपना समय और पैसा लगा रहे हैं।
हालांकि, सोशल मीडिया पर हर प्रतिक्रिया सकारात्मक नहीं रही। कुछ लोगों ने सवाल उठाते हुए कहा कि यह अभियान लाइक्स और पब्लिसिटी हासिल करने का तरीका भी हो सकता है। लेकिन इन सवालों के बावजूद बिट्टू लगातार सफाई अभियान जारी रखे हुए हैं।
नाम ‘तबाही’, काम तबाही रोकने का
इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू बिट्टू का सरनेम है—‘तबाही’। सामान्य तौर पर ‘तबाही’ शब्द किसी बड़े नुकसान या विनाश के लिए इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन ब्यावरा के इस युवा की कहानी में यही शब्द एक अलग मायने ले रहा है।
बिट्टू तबाही खुद नदी में फैली गंदगी की ‘तबाही’ को साफ करने में जुटे हैं। उनका प्रयास यह संदेश देता है कि बदलाव के लिए हमेशा बड़े पद, बड़ी संस्था या बड़े बजट की जरूरत नहीं होती। कई बार एक व्यक्ति की छोटी-सी पहल भी समाज का ध्यान किसी बड़ी समस्या की ओर खींच सकती है।
अजनार नदी की सफाई की यह मुहिम कितनी दूर तक जाती है और नदी की स्थिति में कितना स्थायी बदलाव आता है, यह आने वाला समय बताएगा। लेकिन बिट्टू ने कम से कम एक सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—क्या सार्वजनिक स्थानों और नदियों की सफाई केवल प्रशासन की जिम्मेदारी है, या समाज की भी उतनी ही जिम्मेदारी है?
बिट्टू की कहानी इसी सवाल का जवाब तलाशती नजर आती है। नाम भले ही ‘तबाही’ हो, लेकिन काम फिलहाल तबाही रोकने वाला है।
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