उर्वरक संकट और कालाबाजारी पर कृषि आदान विक्रेता संघ ने सरकार की नीतियों पर उठाए सवाल

Fertilizer dealers association questions government policies regarding the fertilizer crisis and black marketing

भोपाल। मध्यप्रदेश में यूरिया और डीएपी की कमी तथा उर्वरकों की कथित कालाबाजारी को लेकर मध्यप्रदेश कृषि आदान विक्रेता संघ ने राज्य सरकार की उर्वरक वितरण व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं। संघ का कहना है कि सरकार की मौजूदा नीतियों, असंतुलित वितरण व्यवस्था और प्रशासनिक हस्तक्षेप के कारण प्रदेश के किसानों को समय पर पर्याप्त मात्रा में खाद नहीं मिल पा रही है। संघ ने चेतावनी दी है कि यदि रबी सीजन से पहले व्यवस्थाओं में सुधार नहीं किया गया तो उर्वरक वितरण व्यवस्था पर गंभीर संकट खड़ा हो सकता है।

संघ के प्रदेश अध्यक्ष मानसिंह राजपूत ने कहा कि संगठन के पास उर्वरक कारोबार और किसानों की जरूरतों का दशकों का व्यावहारिक अनुभव है। इसके बावजूद सरकार और प्रशासन द्वारा संघ की ओर से समय-समय पर दिए गए सुझावों को अपेक्षित महत्व नहीं दिया गया। उनका कहना है कि नीतियां बनाते समय जमीनी परिस्थितियों और निजी विक्रेताओं की भूमिका को ध्यान में रखना जरूरी है।

75-25 वितरण व्यवस्था पर सवाल

संघ के सचिव संजय रघुवंशी ने बताया कि प्रदेश में करीब 75 प्रतिशत उर्वरक सहकारी समितियों और 25 प्रतिशत निजी विक्रेताओं को दिए जाने की व्यवस्था है। संघ का तर्क है कि यह अनुपात वास्तविक बिक्री व्यवस्था और किसानों की जरूरतों के अनुरूप नहीं है। उनके अनुसार प्रदेश में बड़ी संख्या में PoS मशीनें निजी विक्रेताओं के पास हैं, जबकि सहकारी समितियों को अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में उर्वरक उपलब्ध कराया जा रहा है।

संघ ने आरोप लगाया कि जहां वास्तविक ग्राहकों की संख्या कम है, वहां अधिक स्टॉक उपलब्ध होने से फर्जी बिक्री दर्ज किए जाने और कालाबाजारी की आशंका बढ़ सकती है। संघ ने सरकार से मांग की है कि उर्वरक का वितरण किसी तय अनुपात के बजाय प्रत्येक क्षेत्र की वास्तविक मांग और बिक्री के आंकड़ों के आधार पर किया जाए।

ई-टोकन व्यवस्था से किसानों की परेशानी

संघ ने ई-टोकन व्यवस्था को लेकर भी कई व्यावहारिक समस्याएं गिनाई हैं। संघ के अनुसार बड़ी संख्या में किसानों की Farmer ID नहीं बन पाने के कारण वे ई-टोकन व्यवस्था का लाभ नहीं ले पा रहे हैं। वहीं, जिन किसानों की आवश्यकता 50 बोरी से अधिक है, उनके लिए भी प्रतिमाह 50 बोरी की सीमा निर्धारित होने से परेशानी बढ़ रही है।

किसानों को कई बार उनके गांव या नजदीकी केंद्र के बजाय 30 से 50 किलोमीटर दूर स्थित केंद्रों से उर्वरक आवंटित होने की शिकायत भी सामने आई है। इसके अलावा PoS मशीनों में तकनीकी दिक्कतें और सर्वर संबंधी समस्याएं भी वितरण प्रक्रिया को प्रभावित कर रही हैं। संघ का कहना है कि इन समस्याओं के कारण किसान समय और पैसा दोनों खर्च करने को मजबूर हैं।

कम मार्जिन और परिवहन नीति पर आपत्ति

निजी उर्वरक विक्रेताओं के मार्जिन को लेकर भी संघ ने सरकार के सामने अपनी नाराजगी जाहिर की है। संघ के अनुसार वर्तमान में निजी विक्रेताओं को करीब 1 से 2 प्रतिशत तक ही डीलर मार्जिन मिलता है, जबकि लंबे समय से इसे बढ़ाकर 8 प्रतिशत करने की मांग की जा रही है।

संघ का कहना है कि कम मार्जिन के साथ परिवहन व्यवस्था में असमानता के कारण कई मामलों में व्यापारियों की वास्तविक लागत MRP से अधिक हो जाती है। ऐसी परिस्थितियों में कंपनियों के लिए भी प्रदेश में पर्याप्त मात्रा में उर्वरक भेजना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। संघ का मानना है कि निजी विक्रेताओं को उचित मार्जिन मिलने से वितरण व्यवस्था मजबूत हो सकती है।

प्रदेश उपाध्यक्ष श्रीकृष्ण दुबे ने कहा कि कुछ कंपनियों द्वारा “टैगिंग नहीं तो माल नहीं” जैसी व्यवस्था अपनाए जाने से निजी विक्रेताओं पर ऐसे उत्पादों का अतिरिक्त बोझ पड़ता है, जिनकी बाजार में तत्काल मांग नहीं होती। उन्होंने कहा कि इससे विक्रेताओं की कार्यशील पूंजी प्रभावित होती है और उर्वरक वितरण व्यवस्था पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है।

मूल्य निर्धारण में देरी से उपलब्धता प्रभावित

संघ ने सुपर फास्फेट सहित कुछ उर्वरकों के मूल्य समय पर निर्धारित नहीं होने का मुद्दा भी उठाया है। संघ के अनुसार कई बार स्टॉक उपलब्ध होने के बावजूद ई-टोकन व्यवस्था में उसकी उपलब्धता प्रदर्शित नहीं हो सकी। इससे किसान उपलब्ध उर्वरक से भी वंचित रह गए।

संघ का दावा है कि उर्वरकों की कमी और कीमतों से जुड़ी समस्याओं के कारण कई किसानों को पर्याप्त खाद के बिना ही बोनी करने की स्थिति का सामना करना पड़ा।

स्टॉक वेरिफिकेशन पर भी उठे सवाल

संघ के लीगल हेड राजेश मलैया ने कहा कि ई-टोकन व्यवस्था लागू होने से पहले ही प्रशासन को इसकी व्यावहारिक कमियों के बारे में अवगत कराया गया था। इसके बावजूद समय रहते समाधान नहीं किया गया।

प्रदेश सचिव संजय रघुवंशी ने बताया कि 14 अगस्त को स्टॉक वेरिफिकेशन के नाम पर प्रदेश में उर्वरकों की बिक्री पर रोक लगाई गई थी। इसके बाद 16 अगस्त की शाम बिना स्टॉक वेरिफिकेशन प्रक्रिया पूरी किए बिक्री दोबारा शुरू करने के निर्देश जारी किए गए। संघ ने इस निर्णय की प्रक्रिया और उद्देश्य पर सवाल उठाए हैं।

संघ का कहना है कि यदि वास्तविक भौतिक स्टॉक का PoS रिकॉर्ड से मिलान किया जाता तो उर्वरक की उपलब्धता और वितरण की वास्तविक स्थिति सामने आ सकती थी। संघ ने सहकारी समितियों के स्टॉक का भी प्रभावी भौतिक सत्यापन कराने की मांग की है।

सरकार से छह प्रमुख मांगें

मध्यप्रदेश कृषि आदान विक्रेता संघ ने सरकार से उर्वरक वितरण व्यवस्था में सुधार के लिए छह प्रमुख मांगें रखी हैं। इनमें अनावश्यक प्रशासनिक हस्तक्षेप बंद करना, 75-25 वितरण व्यवस्था को समाप्त कर वास्तविक मांग के आधार पर आवंटन करना, निजी विक्रेताओं का डीलर मार्जिन 8 प्रतिशत करना, परिवहन नीति में असमानता दूर करना, प्रत्येक केंद्र पर निर्धारित उचित मूल्य पर पर्याप्त उर्वरक उपलब्ध कराना तथा वास्तविक स्टॉक और PoS रिकॉर्ड का प्रभावी मिलान सुनिश्चित करना शामिल है।

संघ ने कहा कि किसानों को समय पर खाद उपलब्ध कराना सरकार और प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। संघ ने चेतावनी दी है कि यदि आगामी रबी सीजन से पहले नीतियों में आवश्यक बदलाव नहीं किए गए और निजी उर्वरक विक्रेताओं की समस्याओं की अनदेखी जारी रही, तो प्रदेश की उर्वरक वितरण व्यवस्था गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है।

image

संघ का कहना है कि ऐसी स्थिति में किसानों को होने वाली परेशानी की जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी। अब देखना होगा कि सरकार संघ की मांगों और सुझावों पर क्या कदम उठाती है तथा आगामी रबी सीजन में किसानों को यूरिया, डीएपी और अन्य उर्वरकों की पर्याप्त एवं सुचारू आपूर्ति किस तरह सुनिश्चित की जाती है।

यह भी पढेंः- बायोफैच इंडिया 2026: दुनिया के सामने चमकी भारत की जैविक खेती, 35 देशों के खरीदारों ने दिखाई दिलचस्पी

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *