केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने कहा- संरक्षण और सह-अस्तित्व के लिए स्थानीय समुदायों की भागीदारी जरूरी, भारत की संरक्षण उपलब्धियों को दुनिया के सामने रखा
जयपुर। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री भूपेंद्र यादव ने जयपुर में विश्व प्रकृति कोष (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) के वैश्विक संरक्षण सम्मेलन का उद्घाटन किया। सम्मेलन में दुनिया के 100 से अधिक देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस दौरान केंद्रीय मंत्री ने वन्यजीव संरक्षण, जैव विविधता, प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा और मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व को लेकर वैश्विक स्तर पर मिलकर काम करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
सम्मेलन में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अपर महानिदेशक (वन्यजीव) श्री रमेश पांडे, राजस्थान सरकार के वन बल प्रमुख एवं प्रधान मुख्य वन संरक्षक श्री अरिजीत बनर्जी, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंटरनेशनल के मुख्य संरक्षण अधिकारी श्री दाउदी सांबा तथा डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्री रवि सिंह सहित कई वरिष्ठ अधिकारी और संरक्षण विशेषज्ञ उपस्थित रहे।
संरक्षण के लिए साझा प्रयासों की जरूरत
केंद्रीय मंत्री श्री भूपेंद्र यादव ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि आज संरक्षण के क्षेत्र में दुनिया को एक समुदाय के रूप में फिर से जुड़ने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि संरक्षण के प्रयास केवल सरकारी संस्थाओं तक सीमित नहीं रह सकते। इसमें स्थानीय समुदायों, वनवासियों, किसानों, वैज्ञानिकों, संरक्षणवादियों और विभिन्न संगठनों की सक्रिय भागीदारी जरूरी है।
उन्होंने प्रतिनिधियों से संरक्षण और सह-अस्तित्व के लिए वैश्विक स्तर पर प्रभावी कार्रवाई करने का आह्वान किया। श्री यादव ने कहा कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में संरक्षण के क्षेत्र में जो सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं, उनसे सीख लेकर उन्हें दूसरे क्षेत्रों में भी लागू करने की आवश्यकता है। उन्होंने संरक्षण के लिए आशा, विश्वास और साझा दिशा विकसित करने पर भी जोर दिया।
भारत में बढ़े संरक्षित क्षेत्र
श्री भूपेंद्र यादव ने वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों को रेखांकित करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले एक दशक के दौरान देश में संरक्षण के प्रयासों को व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाया गया है।
उन्होंने बताया कि पिछले दशक में भारत में संरक्षित क्षेत्रों की संख्या लगभग 750 से बढ़कर 1,000 से अधिक हो गई है। इसी अवधि में बाघ अभयारण्यों की संख्या 47 से बढ़कर 58 तथा हाथी अभयारण्यों की संख्या 30 से बढ़कर 33 हुई है।
भारत में आर्द्रभूमि संरक्षण के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण विस्तार हुआ है। केंद्रीय मंत्री के अनुसार रामसर स्थलों की संख्या इसी अवधि में 24 से बढ़कर 101 हो गई है। उन्होंने इसे देश में आर्द्रभूमि और जैव विविधता संरक्षण की दिशा में किए जा रहे प्रयासों का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया।
भारत में चीतों की वापसी का भी किया उल्लेख
केंद्रीय मंत्री ने भारत में चीतों के पुनः आगमन को भी संरक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि देश में विलुप्त हो चुकी प्रजाति को फिर से स्थापित करने के प्रयास संरक्षण के प्रति भारत की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।
श्री यादव ने कहा कि वन्यजीव संरक्षण भारत के लिए केवल आधुनिक कानूनों का विषय नहीं है, बल्कि इसका संबंध देश की संवैधानिक व्यवस्था और सांस्कृतिक मूल्यों से भी जुड़ा हुआ है। उन्होंने बताया कि भारतीय संविधान में वन्यजीवों और पर्यावरण की रक्षा के लिए राज्य के दायित्व के साथ-साथ नागरिकों के कर्तव्यों का भी उल्लेख किया गया है।
अंतरराष्ट्रीय संरक्षण समझौतों के प्रति प्रतिबद्धता
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि भारत सीआईटीईएस, सीएमएस, सीबीडी और रामसर कन्वेंशन जैसे अंतरराष्ट्रीय संरक्षण समझौतों का पक्षकार है। उन्होंने कहा कि बाघ, हाथी, गैंडा और एशियाई शेर जैसी प्रजातियों के संरक्षण और पुनर्बहाली के प्रयास यह दिखाते हैं कि निरंतर संरक्षण प्रयासों से महत्वपूर्ण परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।
उन्होंने संरक्षण में वैज्ञानिक अनुसंधान और निगरानी तंत्र की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया। श्री यादव ने बाघ, हाथी, डॉल्फिन, शेर और हिम तेंदुए जैसी प्रमुख प्रजातियों के अखिल भारतीय जनसंख्या आकलन का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे वैज्ञानिक आंकड़े संरक्षण की रणनीति तैयार करने में मदद करते हैं।
पर्यावास और वन्यजीव गलियारों पर जोर
श्री यादव ने कहा कि किसी प्रजाति का संरक्षण केवल उसके लिए संरक्षित क्षेत्र बनाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसके लिए प्राकृतिक पर्यावास में सुधार, वन्यजीव गलियारों की सुरक्षा और बड़े परिदृश्य स्तर पर संरक्षण की रणनीति अपनाना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक निगरानी और जनसंख्या आकलन से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर संरक्षण योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। इससे वन्यजीवों के आवागमन वाले क्षेत्रों और उनके प्राकृतिक पर्यावास की पहचान कर उन्हें सुरक्षित रखने में सहायता मिलती है।
राजस्थान में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड संरक्षण का उल्लेख
केंद्रीय मंत्री ने राजस्थान में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (जीआईबी) के संरक्षण प्रजनन कार्यक्रम का भी उल्लेख किया। उन्होंने इसे संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयासों का हिस्सा बताया।
इसके साथ ही उन्होंने राजस्थान में ओरण पवित्र उपवनों के सामुदायिक नेतृत्व वाले संरक्षण प्रयासों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि स्थानीय समुदायों की भागीदारी से प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और भूमि क्षरण को रोकने में मदद मिल सकती है।
घास के मैदानों के संरक्षण की जरूरत
श्री भूपेंद्र यादव ने वन और आर्द्रभूमि के साथ-साथ घास के मैदानों के संरक्षण को भी जरूरी बताया। उन्होंने कहा कि संरक्षण की चर्चा में अक्सर जंगलों और आर्द्रभूमियों पर अधिक ध्यान दिया जाता है, जबकि घास के मैदान भी अनेक वन्यजीव प्रजातियों के लिए महत्वपूर्ण पर्यावास हैं।
उन्होंने घास के मैदानों में विशाल शाकाहारी जीवों के संरक्षण के लिए भारत के दृष्टिकोण को साझा किया। साथ ही एक सींग वाले गैंडे और जंगली जल भैंस के संरक्षण के लिए चल रहे कार्यक्रमों की जानकारी भी दी।
संरक्षणवादियों से कार्रवाई का आह्वान
सम्मेलन के दौरान केंद्रीय मंत्री ने दुनिया भर के वन्यजीव संरक्षणवादियों से केवल चिंतन और चर्चा तक सीमित नहीं रहने, बल्कि जमीन पर प्रभावी कदम उठाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि संरक्षण के क्षेत्र में जिन उपायों से सकारात्मक परिणाम मिले हैं, उनसे सीख लेकर उन्हें व्यापक स्तर पर लागू किया जाना चाहिए।
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ वैश्विक संरक्षण सम्मेलन को वन्यजीव संरक्षण, जैव विविधता और मानव-प्रकृति सह-अस्तित्व से जुड़े मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय संवाद के मंच के रूप में देखा जा रहा है। जयपुर में आयोजित सम्मेलन में विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों की भागीदारी के बीच भारत ने अपने संरक्षण अनुभवों, वैज्ञानिक निगरानी तंत्र और समुदाय आधारित संरक्षण प्रयासों को वैश्विक मंच पर साझा किया।
यह भी पढेंः- नकली और घटिया बीजों पर कसेगा शिकंजा, नए ‘सीड एक्ट’ पर किसान संगठनों से सीधा संवाद करेंगे शिवराज
