‘खेत बचाओ अभियान’ बना जनआंदोलन: 2.71 करोड़ लोगों तक पहुंचा संदेश, लाखों किसान हुए जागरूक

Save the Farm Campaign becomes a mass movement Message reaches 27.1 million people millions of farmers become aware

मृदा स्वास्थ्य सुधार, संतुलित उर्वरक उपयोग और टिकाऊ खेती के लिए देशभर में हजारों शिविर; किसानों को वैज्ञानिक खेती अपनाने का आह्वान

हलधर किसान नई दिल्ली। देश में कृषि उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ मिट्टी की उर्वरता को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से चलाया जा रहा ‘खेत बचाओ अभियान’ अब एक बड़े जनजागरूकता आंदोलन का रूप ले चुका है। कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के अंतर्गत भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) द्वारा संचालित इस राष्ट्रव्यापी अभियान ने अब तक 2.712 करोड़ नागरिकों तक अपनी पहुंच बनाकर महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। अभियान का मुख्य उद्देश्य किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग, मृदा परीक्षण आधारित पोषक तत्व प्रबंधन तथा टिकाऊ कृषि पद्धतियों के प्रति जागरूक करना है।

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कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग के कारण मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है, जिससे भविष्य में कृषि उत्पादन पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। इसी चुनौती से निपटने के लिए ‘खेत बचाओ अभियान’ किसानों के बीच वैज्ञानिक खेती के तरीकों को बढ़ावा दे रहा है।

अभियान के तहत अब तक देशभर में 12,979 से अधिक जागरूकता शिविर और सेमिनार आयोजित किए जा चुके हैं। इन कार्यक्रमों में लगभग 7.17 लाख किसानों ने प्रत्यक्ष रूप से भाग लेकर मृदा स्वास्थ्य, उर्वरक संतुलन और टिकाऊ खेती से जुड़ी जानकारियां प्राप्त कीं। यह संख्या बताती है कि किसानों के बीच वैज्ञानिक खेती के प्रति रुचि तेजी से बढ़ रही है।

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केवल जागरूकता तक सीमित न रहते हुए, अभियान के अंतर्गत किसानों और कृषि हितधारकों की क्षमता बढ़ाने के लिए 3,145 प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए। इन प्रशिक्षणों में 1,11,509 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। प्रशिक्षण कार्यक्रमों में मृदा परीक्षण, उर्वरक उपयोग की सही मात्रा, जैविक विकल्पों का इस्तेमाल और आधुनिक कृषि तकनीकों पर विस्तार से जानकारी दी गई।

मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने के लिए हरी खाद, जैव उर्वरक और अन्य जैविक स्रोतों के महत्व पर विशेष जोर दिया गया। इसके लिए 7,928 क्षेत्रीय प्रदर्शनों का आयोजन किया गया, जहां किसानों को व्यावहारिक रूप से टिकाऊ कृषि तकनीकों का प्रदर्शन दिखाया गया। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसे प्रदर्शन किसानों को नई तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं।

अभियान की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता स्थानीय स्तर पर जनप्रतिनिधियों की भागीदारी रही। पंचायत प्रतिनिधियों, सरपंचों और जिला परिषद सदस्यों के सहयोग से 4,916 जनप्रतिनिधि सम्मेलन आयोजित किए गए। इसका उद्देश्य गांव स्तर पर किसानों तक संदेश पहुंचाना और सामूहिक प्रयासों से मिट्टी संरक्षण को बढ़ावा देना था।

उर्वरक डीलरों की भूमिका को भी अभियान में महत्वपूर्ण माना गया। किसानों तक उर्वरकों की पहुंच सुनिश्चित करने वाले डीलरों के साथ 9,609 संवाद कार्यक्रम आयोजित किए गए, ताकि वे संतुलित उर्वरक उपयोग के महत्व को समझें और किसानों को सही सलाह दे सकें। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि उर्वरक विक्रेता वैज्ञानिक जानकारी के साथ किसानों का मार्गदर्शन करें, तो अत्यधिक रासायनिक उपयोग को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

इसके अलावा किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ), स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) और किसान समूह (एफआईजी) के माध्यम से 8,383 किसान सदस्यों को अभियान से जोड़ा गया। इन संगठनों ने ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए देशभर में 53,616 स्थानों पर बैनर, पोस्टर और होर्डिंग्स लगाए गए। वहीं रेडियो और टीवी जैसे पारंपरिक माध्यमों का भी उपयोग किया गया। अभियान के संदेश को प्रसारित करने के लिए 944 रेडियो वार्ताएं और 200 टीवी तथा डिजिटल कार्यक्रम आयोजित किए गए। कुल मिलाकर 1,144 मीडिया प्रसारणों ने अभियान को मजबूत आधार दिया।

सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने अभियान की पहुंच को अभूतपूर्व स्तर तक पहुंचाया। डिजिटल प्रचार के माध्यम से ‘खेत बचाओ अभियान’ 2.712 करोड़ लोगों तक पहुंचा, जिससे खेती और मिट्टी संरक्षण से जुड़े मुद्दों पर व्यापक चर्चा संभव हुई।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में भारत की कृषि व्यवस्था को टिकाऊ बनाने के लिए मृदा स्वास्थ्य पर ध्यान देना बेहद आवश्यक होगा। ‘खेत बचाओ अभियान’ इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है, जो किसानों को वैज्ञानिक सोच अपनाने और भविष्य की खेती को सुरक्षित बनाने के लिए प्रेरित कर रहा है।

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