राष्ट्रीय प्राणी उद्यान के ग्रीष्मकालीन अवकाश कार्यक्रम से बच्चों में बढ़ेगी पर्यावरण संरक्षण की समझ

National Zoological Parks summer vacation program will increase childrens understanding of environmental protection

मिशन लाइफ अभियान के तहत जैव विविधता, वन्यजीव संरक्षण और सतत जीवनशैली पर दिया जा रहा व्यावहारिक प्रशिक्षण

नई दिल्ली, 22 मई। बदलती जलवायु, घटती जैव विविधता और पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच नई पीढ़ी को प्रकृति संरक्षण से जोड़ने के उद्देश्य से राष्ट्रीय प्राणी उद्यान (चिड़ियाघर) द्वारा मिशन लाइफ अभियान के अंतर्गत ग्रीष्मकालीन अवकाश कार्यक्रम (एसवीपी) 2026 की शुरुआत की गई है। यह कार्यक्रम छात्रों में पर्यावरण, वन्यजीव संरक्षण और टिकाऊ जीवनशैली के प्रति जागरूकता विकसित करने का महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है। बुधवार को कार्यक्रम का शुभारंभ दिल्ली-एनसीआर के छात्रों की उत्साहपूर्ण भागीदारी के साथ राष्ट्रीय प्राणी उद्यान के शिक्षा केंद्र में किया गया।

यह विशेष कार्यक्रम विश्व पर्यावरण दिवस की थीम “प्रकृति से प्रेरित। जलवायु के लिए। हमारे भविष्य के लिए।” के अनुरूप आयोजित किया जा रहा है। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य छात्रों को केवल सैद्धांतिक ज्ञान तक सीमित न रखते हुए उन्हें व्यावहारिक गतिविधियों के माध्यम से प्रकृति, जैव विविधता और पर्यावरण संरक्षण के महत्व को समझाना है।

राष्ट्रीय प्राणी उद्यान की ओर से बताया गया कि इस कार्यक्रम के लिए ऑनलाइन माध्यम से भारी उत्साह देखने को मिला। चिड़ियाघर की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध गूगल रजिस्ट्रेशन लिंक के जरिए कुल 854 छात्रों ने आवेदन किया। इनमें से सीमित सीटों के कारण “पहले आओ, पहले पाओ” के आधार पर 60 प्रतिभागियों का चयन किया गया। चयनित छात्रों को पुष्टि के लिए फोन के माध्यम से संपर्क किया गया। कार्यक्रम के उद्घाटन दिवस पर दिल्ली-एनसीआर के 15 विद्यालयों से आए 39 छात्रों ने सक्रिय भागीदारी निभाई।

कार्यक्रम के पहले दिन छात्रों के लिए एक ओरिएंटेशन सत्र आयोजित किया गया, जिसमें उन्हें एसवीपी 2026 की गतिविधियों, उद्देश्यों और आगामी कार्यक्रमों की जानकारी दी गई। इसके बाद प्रतिभागियों को चिड़ियाघर में विभिन्न शाकाहारी एवं मांसाहारी जीवों के बाड़ों का भ्रमण कराया गया। इस भ्रमण का उद्देश्य बच्चों को वन्यजीवों के व्यवहार, उनके प्राकृतिक आवास और संरक्षण संबंधी चुनौतियों के बारे में समझ विकसित करना था।

अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस की पूर्व संध्या पर आयोजित विशेष सत्र में डॉ. फैयाज ए. ने जैव विविधता संरक्षण पर व्याख्यान दिया। उन्होंने छात्रों को समझाया कि जैव विविधता केवल वन्यजीवों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र और मानव जीवन की स्थिरता से जुड़ी हुई है। उन्होंने पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में प्रत्येक जीव और प्राकृतिक संसाधन की भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला।

दो सप्ताह तक चलने वाला यह कार्यक्रम 21 मई से 6 जून 2026 तक संचालित होगा। कार्यक्रम को दो अलग-अलग स्लॉट—स्लॉट ए और स्लॉट बी—में विभाजित किया गया है। प्रत्येक स्लॉट में 50 प्रतिभागियों को शामिल किया गया है, जिनमें 25 जूनियर और 25 सीनियर छात्र हैं। इस प्रकार कार्यक्रम के माध्यम से विभिन्न आयु वर्ग के विद्यार्थियों को सीखने का अवसर दिया जा रहा है।

ग्रीष्मकालीन अवकाश कार्यक्रम में केवल व्याख्यान ही नहीं बल्कि रचनात्मक और सहभागिता आधारित गतिविधियों को भी प्रमुखता दी गई है। छात्रों के लिए वन्यजीव फोटोग्राफी, आर्ट एंड क्राफ्ट, पोस्टर प्रतियोगिता, स्लोगन लेखन, निबंध लेखन, क्ले मॉडलिंग, धरोहर यात्रा, प्रदर्शनियां, विशेषज्ञ वार्ताएं तथा स्वच्छता जागरूकता अभियान जैसी गतिविधियों का आयोजन किया जाएगा। इन गतिविधियों का उद्देश्य बच्चों में रचनात्मकता बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें पर्यावरणीय जिम्मेदारियों के प्रति संवेदनशील बनाना है।

विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूल स्तर पर इस प्रकार के कार्यक्रम भविष्य में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। जब बच्चे कम उम्र में प्रकृति और जैव विविधता के महत्व को समझते हैं, तो वे आगे चलकर जिम्मेदार नागरिक के रूप में पर्यावरण संरक्षण में योगदान देने के लिए प्रेरित होते हैं।

राष्ट्रीय प्राणी उद्यान के निदेशक डॉ. संजीत कुमार ने छात्रों से संवाद करते हुए कहा कि वर्तमान समय में युवाओं को आधुनिक और नवाचार आधारित तकनीकों से जोड़ते हुए पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि संवादात्मक और व्यावहारिक शिक्षा के माध्यम से बच्चों में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता विकसित की जा सकती है, जो भविष्य में जैव विविधता संरक्षण के लिए लाभकारी सिद्ध होगी।

पर्यावरणीय चुनौतियों से जूझती दुनिया में राष्ट्रीय प्राणी उद्यान की यह पहल बच्चों को प्रकृति से जोड़ने और उन्हें संरक्षण की दिशा में प्रेरित करने का प्रभावी प्रयास साबित हो सकती है। ऐसे कार्यक्रम न केवल विद्यार्थियों के ज्ञान को बढ़ाते हैं, बल्कि उन्हें सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारियों के प्रति भी जागरूक बनाते हैं।

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