देश में 707 लाख टन उर्वरकों की खपत, घरेलू उत्पादन मांग के मुकाबले कम; आयात निर्भरता घटाना कृषि नीति के लिए बड़ी चुनौती
नई दिल्ली। भारत कृषि प्रधान देश होने के साथ-साथ दुनिया के सबसे बड़े उर्वरक उपभोक्ता देशों में शामिल है। देश में कृषि उत्पादन बढ़ाने और किसानों की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए हर वर्ष बड़ी मात्रा में उर्वरकों की आवश्यकता होती है। घरेलू उत्पादन क्षमता मांग के अनुरूप पर्याप्त नहीं होने के कारण भारत को यूरिया, डीएपी (DAP), म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP) सहित कई प्रमुख उर्वरकों का बड़े पैमाने पर आयात करना पड़ता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में देश ने 280 लाख टन से अधिक उर्वरकों का आयात किया है। यह आंकड़ा देश की कृषि व्यवस्था में आयातित उर्वरकों पर बढ़ती निर्भरता को दर्शाता है।
उर्वरक क्षेत्र की यह निर्भरता केवल कृषि उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था, सरकारी सब्सिडी और किसानों को समय पर उर्वरक उपलब्ध कराने की व्यवस्था पर भी पड़ता है। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण भारत के सामने आपूर्ति सुनिश्चित करने की चुनौती लगातार बनी रहती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने पर सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी बढ़ सकता है, जबकि वैश्विक स्तर पर आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में घरेलू बाजार में उर्वरकों की उपलब्धता प्रभावित होने की आशंका रहती है।
707 लाख टन उर्वरकों की खपत
उद्योग से उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024-25 में भारत में लगभग 707 लाख टन उर्वरक उत्पादों की खपत हुई। इतनी बड़ी मात्रा में उर्वरकों के उपयोग से कृषि भूमि में पौधों को आवश्यक नाइट्रोजन (N), फास्फोरस (P) और पोटाश (K) जैसे प्रमुख पोषक तत्व उपलब्ध कराए गए। अनुमान के अनुसार, इस दौरान किसानों की फसलों को लगभग 330 लाख टन एनपीके पोषक तत्व प्राप्त हुए।
देश में कृषि योग्य भूमि, बढ़ती आबादी और खाद्यान्न की बढ़ती मांग के कारण आने वाले वर्षों में उर्वरकों की आवश्यकता और बढ़ने की संभावना है। ऐसे में यदि घरेलू उत्पादन क्षमता में अपेक्षित वृद्धि नहीं होती है तो आयात पर निर्भरता और बढ़ सकती है। यही कारण है कि कृषि क्षेत्र के विशेषज्ञ देश में उर्वरक उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ पोषक तत्वों के संतुलित और वैज्ञानिक उपयोग पर जोर दे रहे हैं।
आयात और निर्यात में बड़ा अंतर
भारत एक ओर जहां बड़ी मात्रा में उर्वरकों का आयात करता है, वहीं दूसरी ओर कुछ प्रकार के उर्वरकों का निर्यात भी करता है। हालांकि, भारत जिन प्रमुख उर्वरकों का बड़े पैमाने पर आयात करता है, उन्हीं उत्पादों का बड़े स्तर पर निर्यात नहीं किया जाता। भारत के उर्वरक निर्यात में मुख्य रूप से पोटेशियम सल्फेट, ऑर्गेनिक उर्वरक, पोटेशियम क्लोराइड, अमोनियम नाइट्रेट, स्पेशियलिटी उर्वरक और जैविक खाद शामिल हैं।
इससे स्पष्ट है कि भारत के उर्वरक आयात और निर्यात की प्रकृति अलग-अलग है। आयात में मुख्य रूप से वे उर्वरक शामिल हैं जिनकी देश में कृषि क्षेत्र के लिए बड़े पैमाने पर आवश्यकता है, जबकि निर्यात में अपेक्षाकृत सीमित बाजार वाले विशेष और मूल्यवर्धित उर्वरकों की हिस्सेदारी अधिक है।
श्रीलंका सहित कई देशों को उर्वरक निर्यात
भारत से उर्वरकों के प्रमुख खरीदार देशों में ब्राजील, श्रीलंका, मलेशिया, संयुक्त अरब अमीरात, नेपाल, बांग्लादेश और मालदीव शामिल हैं। विशेष रूप से श्रीलंका को भारतीय उर्वरकों के निर्यात में पिछले दो वर्षों के दौरान उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। भारत के लिए यह निर्यात क्षेत्र नए बाजारों के विस्तार की संभावनाएं जरूर पैदा करता है, लेकिन घरेलू कृषि जरूरतों की तुलना में निर्यात की मात्रा अभी काफी सीमित है।
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का उर्वरक निर्यात लगभग 4.7 लाख टन रहा। पिछले तीन वर्षों में उर्वरक निर्यात में करीब 52 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। निर्यात में यह वृद्धि निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत है, लेकिन इसकी तुलना यदि देश में होने वाली कुल खपत और आयात से की जाए तो तस्वीर अलग दिखाई देती है।
आयात निर्भरता घटाना सबसे बड़ी चुनौती
भारत की कृषि और खाद्य सुरक्षा आज भी काफी हद तक आयातित उर्वरकों की उपलब्धता पर निर्भर है। ऐसे में भविष्य की कृषि नीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती उर्वरकों की आयात निर्भरता को कम करना है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके लिए केवल घरेलू उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि किसानों को उर्वरकों के संतुलित उपयोग के लिए भी जागरूक करना होगा।
नैनो उर्वरकों, जैविक खाद, जैव उर्वरकों और अन्य वैकल्पिक पोषक तत्व स्रोतों को बढ़ावा देने के साथ-साथ पोषक तत्व उपयोग दक्षता (Nutrient Use Efficiency) में सुधार करना भी जरूरी है। मिट्टी की जांच के आधार पर उर्वरकों का उपयोग और फसल की आवश्यकता के अनुसार पोषक तत्वों का प्रबंधन किसानों की लागत घटाने और मिट्टी की सेहत सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
कुल मिलाकर, उर्वरक निर्यात में 52 प्रतिशत की वृद्धि भारत के लिए सकारात्मक संकेत जरूर है, लेकिन देश की उर्वरक अर्थव्यवस्था की वास्तविक तस्वीर 707 लाख टन की घरेलू खपत और 280 लाख टन से अधिक के आयात से सामने आती है। कृषि क्षेत्र की दीर्घकालिक मजबूती और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भारत को घरेलू उर्वरक उत्पादन बढ़ाने, संतुलित उर्वरक उपयोग को प्रोत्साहित करने और वैकल्पिक पोषक तत्व स्रोतों को बढ़ावा देने की दिशा में तेजी से कदम उठाने होंगे। यही आने वाले समय में उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में सबसे बड़ी जरूरत और चुनौती होगी।
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