हलधर किसान दिल्ली l देश की खनिज संपदा को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि सामने आई है। खान मंत्रालय के तहत कार्यरत भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) ने वर्ष 2025-26 के अपने क्षेत्र सर्वेक्षण सत्र को शानदार उपलब्धियों के साथ पूरा कर लिया है। यह साल जीएसआई के लिए खास भी रहा, क्योंकि संस्थान ने अपने 175 वर्ष पूरे करते हुए खनिज अन्वेषण, तकनीकी नवाचार और भू-खतरों के प्रबंधन में नया कीर्तिमान स्थापित किया है।
इस दौरान जीएसआई ने कुल 458 खनिज अन्वेषण परियोजनाएं शुरू कीं, जिनमें से 230 परियोजनाएं देश के लिए बेहद अहम “क्रिटिकल मिनरल्स” पर केंद्रित रहीं। खास बात यह है कि इनमें से 92 परियोजनाएं दुर्लभ पृथ्वी तत्वों (Rare Earth Elements) की खोज से जुड़ी थीं, जो इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा और स्वच्छ ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इससे साफ है कि भारत अब वैश्विक स्तर पर खनिज आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
नीलामी के लिए खनिज ब्लॉकों की तैयारी में भी जीएसआई ने बड़ा काम किया है। वर्ष 2025-26 में कुल 80 भूवैज्ञानिक रिपोर्टें सरकार को सौंपी गईं, जिनमें 39 रिपोर्टें महत्वपूर्ण खनिजों से संबंधित हैं। इसके अलावा 4 कोयला ब्लॉक और 11 अन्वेषण लाइसेंस ब्लॉक भी विकास के लिए सौंपे गए। राजस्थान के सिवाना क्षेत्र में 7 खनिज लक्ष्यीकरण ब्लॉक और 15 जी3 स्तर के ब्लॉक निजी एजेंसियों के माध्यम से अन्वेषण के लिए प्रस्तावित किए गए हैं, जिससे निजी क्षेत्र की भागीदारी को भी बढ़ावा मिलेगा।
इस साल की सबसे बड़ी उपलब्धियों में एक अनोखी खोज भी शामिल है। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में प्राकृतिक हाइड्रोजन गैस के भंडार मिलने की जानकारी सामने आई है। यह खोज भारत को स्वच्छ ऊर्जा के वैश्विक नक्शे पर मजबूती से स्थापित कर सकती है और भविष्य में ऊर्जा क्षेत्र में क्रांति ला सकती है।
भू-वैज्ञानिक डेटा को मजबूत करने के लिए जीएसआई ने बड़े स्तर पर सर्वेक्षण किए। 22,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बड़े पैमाने पर मैपिंग की गई, जबकि दक्कन ट्रैप क्षेत्र में 28,000 वर्ग किलोमीटर में भू-रासायनिक सर्वेक्षण किए गए। इसके अलावा लगभग 3.8 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में जमीनी और 95,000 वर्ग किलोमीटर में हवाई भू-भौतिकीय सर्वेक्षण किए गए। इससे खनिज संसाधनों के सही आकलन और भविष्य की रणनीति बनाने में मदद मिलेगी।
तकनीकी क्षेत्र में भी जीएसआई ने आधुनिक तकनीकों को अपनाते हुए बड़ा कदम उठाया है। राजस्थान और ओडिशा में ड्रोन आधारित चुंबकीय सर्वेक्षण शुरू किए गए हैं, जो खनिज खोज को और तेज और सटीक बनाएंगे। साथ ही, एआई आधारित खनिज लक्ष्यीकरण मॉडल के लिए जीएसआई टीम को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान भी मिला है।
भू-खतरों से निपटने में भी जीएसआई की भूमिका अहम रही। राष्ट्रीय भूस्खलन पूर्वानुमान केंद्र (NLFC) की पहुंच अब 8 राज्यों के 21 जिलों तक बढ़ा दी गई है। डिजिटल प्लेटफॉर्म और मोबाइल ऐप के जरिए रियल टाइम चेतावनी प्रणाली विकसित की गई है, जिससे जान-माल के नुकसान को कम किया जा सके।
इंफ्रास्ट्रक्चर विकास में भी जीएसआई का योगदान उल्लेखनीय रहा। देशभर में 10,200 मेगावाट क्षमता वाली 8 पंप स्टोरेज परियोजनाओं का मूल्यांकन किया गया, जबकि 17 नई परियोजनाएं जांच के अधीन हैं। इसके अलावा सड़क, रेलवे और जल परियोजनाओं के लिए 28 भू-तकनीकी जांच पूरी की गई हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी जीएसआई ने अपनी पहचान मजबूत की है। British Geological Survey और Geoscience Australia जैसे संस्थानों के साथ साझेदारी कर भारत ने खनिज अनुसंधान में वैश्विक सहयोग को बढ़ावा दिया है। वहीं देश के भीतर आईआईटी जैसे संस्थानों के साथ मिलकर उन्नत शोध कार्य किए जा रहे हैं।
अब नजरें 2026-27 के क्षेत्र सत्र पर हैं, जहां जीएसआई ने और भी बड़े लक्ष्य तय किए हैं। अगले वर्ष करीब 500 नई परियोजनाएं शुरू करने की योजना है, जिनमें 300 परियोजनाएं महत्वपूर्ण खनिजों पर केंद्रित होंगी। इसके साथ ही एआई, मशीन लर्निंग और भू-स्थानिक तकनीकों का उपयोग बढ़ाकर डेटा विश्लेषण को और मजबूत किया जाएगा।
कुल मिलाकर, 175 वर्षों की विरासत के साथ जीएसआई ने यह साबित कर दिया है कि वह देश की खनिज सुरक्षा, अवसंरचना विकास और सतत प्रगति की मजबूत आधारशिला बना हुआ है। आने वाले वर्षों में यह संस्थान भारत को संसाधन संपन्न और आत्मनिर्भर बनाने में और भी अहम भूमिका निभाएगा।
यह भी पढेंः- केंद्रीय कृषि मंत्री से महाराष्ट्र के कृषि मंत्री ने की मुलाकात, किसानों के हित में कई अहम मुद्दों पर चर्चा
