इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद मध्य प्रदेश की उर्वरक व्यवस्था पर सवाल

Madhya Pradeshs fertilizer system in question after Allahabad High Courts comment

संजय रघुवंशी बोले—अधिकार क्षेत्र से बाहर के आदेशों की हो समीक्षा, कृष्णा दुबे ने उठाया 75:25 वितरण व्यवस्था का मुद्दा

हलधर किसान भोपाल/इंदौर। उर्वरक वितरण को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक महत्वपूर्ण टिप्पणी के बाद मध्य प्रदेश में भी उर्वरक वितरण की प्रशासनिक व्यवस्था और अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र को लेकर सवाल उठने लगे हैं। हाईकोर्ट ने उर्वरक (नियंत्रण) आदेश, 1985 के तहत जिलाधिकारी की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए कहा कि जिलाधिकारी को उर्वरक वितरण के लिए ‘पर्यवेक्षण प्राधिकारी’ (Supervising Authority) के रूप में कार्य करने की शक्ति प्राप्त नहीं है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की इस टिप्पणी के बाद कृषि आदान क्षेत्र से जुड़े पदाधिकारियों ने मध्य प्रदेश में उर्वरक वितरण को लेकर लागू व्यवस्थाओं की वैधानिकता पर सवाल उठाए हैं। राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं प्रदेश सचिव संजय रघुवंशी और प्रदेश उपाध्यक्ष एवं जागरूक कृषि आदान विक्रेता संघ, जिला इंदौर के अध्यक्ष कृष्णा दुबे ने प्रदेश में उर्वरक वितरण से जुड़े प्रशासनिक आदेशों की समीक्षा की मांग की है।

रघुवंशी बोले—अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर जारी किए जा रहे आदेश

राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं प्रदेश सचिव संजय रघुवंशी ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी से यह विषय महत्वपूर्ण हो गया है कि प्रशासनिक अधिकारियों को किसी विशेष कानून या आदेश के तहत कितनी शक्तियां प्राप्त हैं और उन शक्तियों की सीमा क्या है।

रघुवंशी ने आरोप लगाया कि मध्य प्रदेश में कृषि विभाग के सचिव और विभिन्न जिलों के कलेक्टर समय-समय पर अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर ऐसे निर्देश जारी करते हैं, जिन्हें संगठन वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप नहीं मानता। उनके अनुसार, इसके बाद भी संबंधित अधिकारी उन निर्देशों को प्रदेश या जिलों में लागू करते हैं।

उन्होंने कहा कि उर्वरक जैसे महत्वपूर्ण कृषि इनपुट के वितरण में किसी भी प्रकार की व्यवस्था लागू करने से पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि उसका आधार संबंधित कानून, नियम या वैधानिक आदेश में है या नहीं।

75:25 वितरण व्यवस्था पर उठाया सवाल

संजय रघुवंशी ने मध्य प्रदेश में उर्वरक वितरण की 75:25 व्यवस्था को भी प्रमुख मुद्दा बताया। उनके अनुसार, प्रदेश में मार्कफेड एवं सहकारी समितियों के माध्यम से 75 प्रतिशत यूरिया और DAP तथा निजी कृषि आदान विक्रेताओं के माध्यम से 25 प्रतिशत उर्वरक उपलब्ध कराने की व्यवस्था लागू की गई है।

रघुवंशी का कहना है कि Fertilizer (Control) Order, 1985 में इस प्रकार के वितरण अनुपात का स्पष्ट प्रावधान नहीं है। ऐसे में इस व्यवस्था के वैधानिक आधार को स्पष्ट किया जाना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि किसानों को समय पर उर्वरक उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए, लेकिन इसके लिए ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए जो कानून के अनुरूप होने के साथ-साथ किसानों और कृषि आदान व्यापारियों दोनों के लिए पारदर्शी हो।

कृष्णा दुबे बोले—व्यापारियों पर कार्रवाई से पहले अधिकार स्पष्ट हों

प्रदेश उपाध्यक्ष एवं जागरूक कृषि आदान विक्रेता संघ, जिला इंदौर के अध्यक्ष कृष्णा दुबे ने भी उर्वरक वितरण में जिला प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाए।

दुबे ने कहा कि Fertilizer Control Act और Fertilizer (Control) Order, 1985 में जिलाधिकारी या कलेक्टर को उर्वरक वितरण के मामलों में इस प्रकार हस्तक्षेप करने का स्पष्ट अधिकार नहीं है। उनका कहना है कि इसके बावजूद मध्य प्रदेश के कई जिलों में कृषि आदान व्यापारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की गई है और कुछ मामलों में जिला प्रशासन की ओर से भी आदेश जारी किए गए।

उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में कृषि आदान व्यापारियों के सामने यह स्पष्ट होना जरूरी है कि किसी अधिकारी को किस कानून के तहत आदेश जारी करने या कार्रवाई करने का अधिकार प्राप्त है।

दुबे ने कहा कि कृषि आदान व्यापारी किसानों तक बीज, उर्वरक और अन्य आवश्यक सामग्री पहुंचाने की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। इसलिए वितरण व्यवस्था बनाते समय व्यापारियों की भूमिका और उनके अधिकारों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

सहकारी और निजी क्षेत्र के बीच वितरण पर पुनर्विचार की मांग

कृष्णा दुबे ने मध्य प्रदेश में सहकारी समितियों और निजी कृषि आदान विक्रेताओं के बीच उर्वरक वितरण के अनुपात पर भी आपत्ति जताई।

उनके अनुसार, सहकारी समितियों को 75 प्रतिशत और निजी कृषि आदान व्यापारियों को 25 प्रतिशत उर्वरक उपलब्ध कराने की व्यवस्था प्रदेश में लागू होने की बात सामने आती है। दुबे ने दावा किया कि देश के अन्य राज्यों में इस तरह की व्यवस्था नहीं है।

उन्होंने मांग की कि मध्य प्रदेश सरकार इस व्यवस्था का वैधानिक आधार सार्वजनिक करे और यदि इसमें किसी प्रकार की कमी है तो उसे दूर किया जाए। उनका कहना है कि उर्वरक वितरण की ऐसी प्रणाली होनी चाहिए जिसमें किसानों को पर्याप्त मात्रा में समय पर खाद मिले और किसी एक वितरण माध्यम को अनुचित लाभ या नुकसान न हो।

ई-विकास प्रणाली पर भी जताई आपत्ति

दुबे और रघुवंशी ने वर्तमान में लागू की जा रही ई-विकास प्रणाली को लेकर भी सवाल उठाए हैं। रघुवंशी के अनुसार, कृषि आदान व्यापारियों पर किसी भी नई प्रणाली को लागू करने से पहले उसके नियम, अधिकार क्षेत्र और वैधानिक आधार स्पष्ट किए जाने चाहिए।

संगठन का कहना है कि डिजिटल व्यवस्था का उद्देश्य पारदर्शिता और सुविधा बढ़ाना होना चाहिए, न कि व्यापारियों के लिए अनावश्यक कठिनाइयां पैदा करना।

केंद्रीय कृषि मंत्रालय से हस्तक्षेप की मांग

संजय रघुवंशी और कृष्णा दुबे सहित संगठन के पदाधिकारियों ने राज्य सरकार, कृषि विभाग और केंद्रीय कृषि मंत्रालय से पूरे मामले की समीक्षा करने की मांग की है।

संगठन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं प्रदेश अध्यक्ष श्रीमान सिंह राजपूत, राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं प्रदेश सचिव संजय रघुवंशी, राष्ट्रीय संगठन के लीगल एडवाइजर राजेश मलैया तथा प्रदेश उपाध्यक्ष कृष्णा दुबे ने मांग की है कि मध्य प्रदेश में उर्वरक वितरण से संबंधित प्रशासनिक आदेशों और व्यवस्थाओं की वैधानिकता स्पष्ट की जाए।

हाईकोर्ट में DAP आपूर्ति का मामला

जिस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने टिप्पणी की, उसमें मिर्जापुर की Marihan Agro Farmer Producer Company Limited ने 100 टन DAP की मांग की थी, लेकिन उसे 45 टन DAP की आपूर्ति की गई। सुनवाई के दौरान जिलाधिकारी ने अपने शपथपत्र में स्वीकार किया कि Fertilizer (Control) Order, 1985 के तहत उन्हें उर्वरक वितरण के लिए ‘Supervising Authority’ के रूप में कार्य करने की शक्ति प्राप्त नहीं है।

अदालत ने संबंधित प्रशासनिक निर्देशों की वैधानिक प्रकृति पर भी सवाल उठाए और याचिकाकर्ता को उसकी मांग के अनुसार 100 टन DAP उपलब्ध कराने के लिए अंतरिम मैंडमस जारी किया।

हालांकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह मामला उत्तर प्रदेश से संबंधित है, लेकिन इसकी टिप्पणी के बाद मध्य प्रदेश में उर्वरक वितरण व्यवस्था को लेकर उठाए गए सवालों ने इस विषय को चर्चा में ला दिया है।

अब संगठन की मांग है कि मध्य प्रदेश में उर्वरक वितरण से जुड़े आदेशों, जिला प्रशासन की भूमिका, 75:25 वितरण व्यवस्था और ई-विकास प्रणाली के कानूनी आधार को स्पष्ट किया जाए, ताकि किसानों और कृषि आदान व्यापारियों के बीच बनी असमंजस की स्थिति दूर हो सके।

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