भारत विज्ञान, नवाचार और अंतरिक्ष की नई उड़ान भर रहा है — आत्मनिर्भरता और वैश्विक पहचान का युग शुरू
केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा है कि पिछले 11 वर्षों में विज्ञान और तकनीक ने आम भारतीय के जीवन को पूरी तरह बदल दिया है। उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी अब हर भारतीय घर में प्रवेश कर चुकी है, और इससे जीवन सुगम होने के साथ-साथ अनुसंधान एवं नवाचार की राह भी सुलभ हुई है।

अंतरिक्ष, परमाणु और जैव प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में ऐतिहासिक सुधार
डॉ. सिंह ने प्रधानमंत्री द्वारा अंतरिक्ष और परमाणु क्षेत्रों को निजी भागीदारी के लिए खोलने के साहसिक निर्णयों की सराहना करते हुए कहा कि इन सुधारों का असर कृषि, शिक्षा, रक्षा, भूमि रिकॉर्ड, आपदा प्रबंधन और ई-गवर्नेंस तक में देखा जा रहा है।
उन्होंने कहा कि भारत अब विज्ञान व नवाचार द्वारा प्रेरित आकांक्षी युवाओं का केंद्र बन रहा है, और विदेशों में बसे भारतवंशी आज अपने देश की पहचान को गर्व से धारण कर रहे हैं, जिसे विश्व स्तर पर मान्यता भी मिल रही है।
बायो-ई3 नीति: जैव प्रौद्योगिकी क्रांति की अगुवाई
डॉ. सिंह ने हाल ही में शुरू की गई बायो-ई3 नीति का ज़िक्र करते हुए बताया कि यह नीति अर्थव्यवस्था, रोजगार और पर्यावरण के तीनों पहलुओं पर केंद्रित है, और इसे जैव प्रौद्योगिकी-संचालित क्रांति का अग्रदूत माना जा रहा है।
स्वास्थ्य नवाचार में वैश्विक नेतृत्व
उन्होंने निवारक स्वास्थ्य सेवाओं में भारत के योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत ने दुनिया का पहला डीएनए-आधारित कोविड वैक्सीन विकसित किया, और सबसे बड़ा वैक्सीनेशन अभियान भी चलाया।
अंतरिक्ष मिशनों में भारत की ऐतिहासिक प्रगति
डॉ. सिंह ने बताया कि भले ही भारत ने अंतरिक्ष क्षेत्र में देर से शुरुआत की, पर चंद्रयान-3 की सफलता ने भारत को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव तक पहुंचने वाला पहला देश बना दिया।
आगामी Axiom-4 मिशन में भारत की भागीदारी पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला इस मिशन में पायलट के रूप में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। इस मिशन में भारत द्वारा विकसित माइक्रोग्रैविटी अनुकूल बायोटेक किटों का प्रयोग कर अंतरिक्ष पोषण और आत्मनिर्भर जीवन रक्षक प्रणाली पर शोध किया जाएगा।
भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का विस्तार
मंत्री ने कहा कि भारत की वर्तमान अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था 8 अरब डॉलर तक है, और आने वाले वर्षों में इसके 44 अरब डॉलर तक पहुँचने की संभावना है।
उन्होंने बताया कि भारत में अब 300 से अधिक अंतरिक्ष स्टार्टअप हैं — जबकि 2014 में इनकी संख्या केवल गिनी-चुनी थी।
प्रौद्योगिकी आधारित नागरिक सेवाएं: वैश्विक मॉडल
डॉ. सिंह ने कहा कि भारत में फेस रिकॉग्निशन टेक्नोलॉजी जैसी सुविधाओं के माध्यम से पेंशनभोगी अब केवल फोन और कैमरे से पहचान सत्यापित कर सकते हैं, जिससे वरिष्ठ नागरिकों को सुविधा मिली है।
इसके अलावा, भारत का CPGRAMS (Centralized Public Grievance Redress And Monitoring System) अब एक वैश्विक मॉडल बन चुका है। 2014 में जहां सालाना 2 लाख शिकायतों का निपटान होता था, वह आंकड़ा अब 26 लाख तक पहुँच चुका है।
उन्होंने केवल एआई मॉडल पर अत्यधिक निर्भरता के प्रति आगाह किया और एक हाइब्रिड मॉडल का प्रस्ताव दिया, जो सार्वजनिक सेवा वितरण में संवेदना एवं अखंडता को बनाए रखने के उद्देश्य से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को मानवीय बुद्धिमत्ता के साथ अनुकूलतम रूप से मिश्रित करता है।
केंद्रीय मंत्री ने अपने निष्कर्ष में कहा है कि “भारत एक ऐसे राष्ट्र के रूप में विकसित हो चुका है, जहां वैज्ञानिक अनुसंधान सिर्फ अकादमिक नहीं है, बल्कि यह रणनीतिक, सुरक्षित और संप्रभु है।”
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