पराली प्रबंधन के स्थायी समाधान के लिए केंद्र की बड़ी तैयारी, 544 करोड़ रुपये का प्रावधान
हलधर किसान नई दिल्ली। देश में हर वर्ष धान कटाई के बाद पराली जलाने से उत्पन्न होने वाली पर्यावरणीय और कृषि संबंधी चुनौतियों से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने व्यापक रणनीति तैयार की है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री Shivraj Singh Chouhan और केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री Bhupender Yadav ने कृषि भवन, नई दिल्ली में आयोजित एक उच्च स्तरीय अंतर-मंत्रालयी बैठक में पराली प्रबंधन की वर्तमान स्थिति और आगामी खरीफ सीजन की तैयारियों की विस्तृत समीक्षा की।
बैठक में फसल अवशेष प्रबंधन (सीआरएम) योजना के तहत हुई प्रगति, राज्यों द्वारा तैयार की गई कार्ययोजनाओं तथा पराली के स्थायी समाधान पर विस्तार से चर्चा की गई। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्पष्ट कहा कि पराली जलाना केवल वायु प्रदूषण का कारण नहीं है, बल्कि इससे मिट्टी की उर्वरता भी प्रभावित होती है। पराली जलाने से खेतों में मौजूद लाभकारी सूक्ष्म जीव और मित्र कीट नष्ट हो जाते हैं, जिससे भूमि की उत्पादक क्षमता पर प्रतिकूल असर पड़ता है।
उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2018-19 में फसल अवशेष प्रबंधन योजना शुरू की थी। इस योजना के अंतर्गत पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) को अब तक कुल 4,266.47 करोड़ रुपये की सहायता उपलब्ध कराई गई है। इस वित्तीय सहयोग के परिणामस्वरूप देशभर में 3.54 लाख से अधिक फसल अवशेष प्रबंधन मशीनों का वितरण किया गया तथा 43,500 से अधिक कस्टम हायरिंग केंद्र स्थापित किए गए हैं।
आगामी वर्ष 2026-27 के लिए केंद्र सरकार ने 544.15 करोड़ रुपये का बजट प्रावधान किया है, जिसमें से 272.07 करोड़ रुपये की पहली किस्त पहले ही जारी की जा चुकी है। राज्यों ने इस वर्ष 46,000 से अधिक फसल अवशेष प्रबंधन मशीनों के वितरण, 910 नए कस्टम हायरिंग केंद्रों की स्थापना तथा 141 पराली आपूर्ति श्रृंखला परियोजनाओं के विकास का लक्ष्य निर्धारित किया है।
बैठक में यह भी बताया गया कि वर्ष 2026 की धान कटाई के दौरान लगभग 2.762 करोड़ टन पराली उत्पन्न होने का अनुमान है। इसके प्रभावी प्रबंधन के लिए राज्यों ने विस्तृत कार्ययोजनाएं तैयार की हैं। केंद्र सरकार ने राज्यों को निर्देश दिए हैं कि अगस्त 2026 से पहले मशीनों का वितरण पूरा किया जाए तथा किसानों तक सभी आवश्यक संसाधन समय पर पहुंचाए जाएं।
पराली के आर्थिक उपयोग को बढ़ावा देने पर भी विशेष जोर दिया गया। दोनों केंद्रीय मंत्रियों ने बायोमास विद्युत संयंत्रों, संपीड़ित बायोगैस (सीबीजी) इकाइयों, एथेनॉल उत्पादन संयंत्रों और पेलेट निर्माण इकाइयों में पराली के उपयोग को बढ़ाने की आवश्यकता बताई। उनका कहना था कि इससे पराली के लिए स्थायी बाजार विकसित होगा और किसानों को अतिरिक्त आय के अवसर प्राप्त होंगे। सरकार की कोशिश है कि पराली को कृषि अपशिष्ट के बजाय आर्थिक संसाधन के रूप में स्थापित किया जाए।
बैठक में धान की ऐसी किस्मों को बढ़ावा देने पर भी बल दिया गया जो कम अवधि में तैयार होती हैं और जिनमें पानी की आवश्यकता भी कम होती है। इससे धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच का समय बढ़ सकेगा तथा किसानों को पराली प्रबंधन के लिए पर्याप्त अवसर मिलेगा। केंद्रीय कृषि मंत्री ने बताया कि लंबी अवधि वाली धान किस्मों को हतोत्साहित करने और वैकल्पिक उन्नत किस्मों को बढ़ावा देने के लिए आईसीएआर तथा राज्य कृषि संस्थानों के माध्यम से पहले से ही प्रयास किए जा रहे हैं।
पराली जलाने की घटनाओं पर निगरानी के लिए भी विशेष व्यवस्था की जा रही है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के 14 जिलों की 70 तहसीलों में ‘पराली सुरक्षा बल’ को सक्रिय किया जाएगा, जो रियल टाइम मॉनिटरिंग और निगरानी के माध्यम से पराली जलाने की घटनाओं को रोकने का कार्य करेगा। इसके अलावा जन-जागरूकता अभियानों को भी व्यापक स्तर पर चलाया जाएगा ताकि किसान पराली जलाने के दुष्प्रभावों और वैकल्पिक समाधानों के प्रति जागरूक हो सकें।
शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि जिन खेतों में पराली को जलाने के बजाय मिट्टी में मिलाया गया, वहां उत्पादकता में वृद्धि देखने को मिली है। उन्होंने डायरेक्ट सीडेड राइस (डीएसआर) तकनीक को भी प्रभावी रूप से बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई।
बैठक के अंत में दोनों केंद्रीय मंत्रियों ने दोहराया कि यंत्रीकरण, तकनीकी नवाचार, औद्योगिक उपयोग, जन-जागरूकता और सभी हितधारकों के समन्वित प्रयासों से पराली जलाने की समस्या का स्थायी समाधान संभव है। केंद्र सरकार पर्यावरण संरक्षण, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और किसानों की आय बढ़ाने के लिए पराली प्रबंधन के स्थायी मॉडल विकसित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
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