हलधर किसान नई दिल्ली। विश्व मरुस्थलीकरण एवं सूखा निवारण दिवस 2026 के अवसर पर आयोजित राष्ट्रीय कार्यक्रम में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि भारत ने भूमि पुनर्स्थापन के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति करते हुए बॉन चैलेंज के तहत वर्ष 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर भूमि को पुनर्स्थापित करने के लक्ष्य के मुकाबले अब तक 21.76 मिलियन हेक्टेयर भूमि को पुनर्स्थापन प्रयासों के दायरे में ला दिया है। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि भारत की मजबूत नीतियों, वैज्ञानिक नवाचारों और जनभागीदारी का परिणाम है।
नई दिल्ली स्थित इंदिरा पर्यावरण भवन में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए श्री यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित 26 मिलियन हेक्टेयर खराब एवं वनों की कटाई से प्रभावित भूमि को बहाल करने की प्रतिबद्धता विश्व की सबसे बड़ी पुनर्स्थापन पहलों में से एक है। उन्होंने बताया कि इन प्रयासों से अब तक लगभग 1.22 बिलियन व्यक्ति-दिवस रोजगार का सृजन भी हुआ है।
मंत्री ने कहा कि सतत भूमि प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भारत लगातार अग्रणी भूमिका निभा रहा है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के जलसंभर विकास घटक के अंतर्गत 27 मिलियन हेक्टेयर से अधिक भूमि का उपचार किया जा चुका है तथा 61.3 मिलियन से अधिक भू-टैग आधारित प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन परिसंपत्तियां विकसित की गई हैं।
उन्होंने बताया कि ग्रीन इंडिया मिशन के तहत लगभग 1.7 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में हरियाली और पुनर्स्थापन कार्य किए गए हैं, जबकि पिछले पांच वर्षों में सीएएमपीए समर्थित कार्यक्रमों के माध्यम से 3.20 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में वृक्षारोपण किया गया है। संयुक्त वन प्रबंधन कार्यक्रम वर्तमान में 81.53 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में संचालित हो रहा है, जो विश्व की सबसे बड़ी सामुदायिक वन प्रबंधन व्यवस्थाओं में से एक है।
श्री यादव ने बताया कि कृषि वानिकी को बढ़ावा देने के लिए 1.21 लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि को इसके दायरे में लाया गया है, वहीं लगभग 60 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में वनों के बाहर बांस का रोपण किया गया है। उन्होंने प्रधानमंत्री के “एक पेड़ मां के नाम” अभियान का उल्लेख करते हुए कहा कि देशभर में अब तक 266 करोड़ से अधिक पौधे लगाए जा चुके हैं।
कार्यक्रम के दौरान मंत्री ने अरावली ग्रीन वॉल पहल की विशेष रूप से सराहना करते हुए कहा कि इस महत्वाकांक्षी परियोजना ने वित्तीय वर्ष 2025-26 में निर्धारित वार्षिक लक्ष्यों को भी पार कर लिया है। इसके साथ ही मिष्टी कार्यक्रम के तहत वर्ष 2028 तक 54 हजार हेक्टेयर मैंग्रोव क्षेत्र के पुनर्स्थापन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
उन्होंने कहा कि जलीय पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण की राष्ट्रीय योजना के माध्यम से रामसर स्थलों सहित विभिन्न आर्द्रभूमियों के संरक्षण और पुनर्स्थापन को समर्थन दिया जा रहा है। वहीं देशभर में 26 करोड़ से अधिक मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी किए जा चुके हैं, जो भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
इस वर्ष विश्व मरुस्थलीकरण एवं सूखा निवारण दिवस की थीम “चारागाह: पहचानें, सम्मान करें और पुनर्स्थापित करें” रखी गई थी। इस विषय पर बोलते हुए श्री यादव ने कहा कि घास के मैदान और चारागाह जैव विविधता संरक्षण, पशुधन आधारित आजीविका, कार्बन पृथक्करण, जल संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से मुकाबले में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उन्होंने बताया कि भारत की शुष्क भूमि लगभग 228 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में फैली हुई है, जो कृषि, पशुपालन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की आधारशिला है। भारत मरुस्थलीकरण एवं भूमि क्षरण एटलस के अनुसार देश की लगभग 97.85 मिलियन हेक्टेयर भूमि, यानी कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 29.77 प्रतिशत हिस्सा, भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण से प्रभावित है।
कार्यक्रम के अवसर पर केंद्रीय मंत्री ने “इंडियन फॉरेस्टर” पत्रिका का विशेष अंक तथा बॉन चैलेंज (2011-2020) पर भारत की दूसरी प्रगति रिपोर्ट भी जारी की। पर्यावरण मंत्रालय और अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) के सहयोग से तैयार इस रिपोर्ट में विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में चल रहे भूमि पुनर्स्थापन कार्यों, उनके सामाजिक-आर्थिक लाभों तथा पारिस्थितिक प्रभावों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया है।
कार्यक्रम में वन महानिदेशक एवं विशेष सचिव सुशील कुमार अवस्थी, पर्यावरण मंत्रालय के सचिव तन्मय कुमार, यूएनडीपी की रेजिडेंट रिप्रेजेंटेटिव डॉ. एंजेला लुसिगी सहित केंद्र एवं राज्य सरकारों, अनुसंधान संस्थानों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों तथा नागरिक समाज के लगभग 200 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
विशेषज्ञों ने माना कि भूमि क्षरण तटस्थता प्राप्त करने और भारत के उन्नत बॉन चैलेंज लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सरकार, वैज्ञानिक संस्थानों, स्थानीय समुदायों और विकास भागीदारों के बीच निरंतर सहयोग आवश्यक होगा। कार्यक्रम का समापन भूमि पुनर्स्थापन को गति देने, टिकाऊ भूमि प्रबंधन को मजबूत बनाने और आने वाली पीढ़ियों के लिए हरित एवं सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित करने के संकल्प के साथ हुआ।
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