खलघाट से मुरैना तक किसानों का उबाल: फसल के दाम, खाद और खरीदी संकट को लेकर हाईवे पर उतरे किसान

Farmers from Khalghat to Morena are furious Farmers took to the highway over crop prices fertilizers and procurement crises

हलधर किसान धार/भोपाल। मध्यप्रदेश में किसानों की समस्याओं को लेकर 7 मई 2026 को बड़ा राजनीतिक और किसान आंदोलन देखने को मिला। कांग्रेस के आह्वान पर धार जिले के खलघाट सहित प्रदेश के सात प्रमुख स्थानों पर किसानों ने आगरा–मुंबई राष्ट्रीय राजमार्ग (एबी रोड) पर चक्काजाम कर सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। यह आंदोलन केवल सड़क जाम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि किसानों के बढ़ते आक्रोश, आर्थिक संकट और सरकारी व्यवस्थाओं से नाराजगी की खुली तस्वीर बनकर सामने आया।

धार जिले के खलघाट में हुए मुख्य प्रदर्शन में बड़ी संख्या में किसान, कांग्रेस कार्यकर्ता और वरिष्ठ नेता शामिल हुए। आंदोलन में पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया, पूर्व मंत्री विजयलक्ष्मी साधौ, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार सहित कई विधायक और कांग्रेस पदाधिकारी मौजूद रहे। आंदोलन में धार, खरगोन, बड़वानी, झाबुआ, अलीराजपुर, खंडवा और बुरहानपुर जिलों से किसान पहुंचे। कांग्रेस का दावा था कि प्रदेशभर में लगभग 50 हजार कार्यकर्ता और किसान इस आंदोलन में शामिल हुए।

किसानों का कहना था कि उन्हें गेहूं और अन्य फसलों का उचित दाम नहीं मिल रहा है। मंडियों में खरीदी की प्रक्रिया बेहद धीमी है, जिससे किसान परेशान हैं। कई किसानों ने आरोप लगाया कि मंडियों में लंबी कतारों के बावजूद खरीदी समय पर नहीं हो रही, जिससे उनकी उपज खराब होने की स्थिति में पहुंच रही है। इसके अलावा खाद की कमी और बिजली संकट ने किसानों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।

खलघाट में प्रदर्शनकारियों ने हाईवे पर बैठकर नारेबाजी की और सरकार से तत्काल समाधान की मांग की। किसानों का कहना था कि लगातार बढ़ती लागत और फसल के कम दाम के कारण खेती घाटे का सौदा बनती जा रही है। आंदोलन के दौरान कई किसानों ने यह भी कहा कि अगर सरकार उनकी मांगों को गंभीरता से नहीं लेती, तो आने वाले समय में आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है।

प्रदेशभर में यह आंदोलन खलघाट तक सीमित नहीं रहा। शाजापुर के रोजवास टोल प्लाजा, ग्वालियर के निरावली तिराहे, इंदौर बायपास, महू और मुरैना सहित कई स्थानों पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं और किसानों ने हाईवे जाम कर प्रदर्शन किया। कई जगहों पर पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच धक्का-मुक्की और नोकझोंक की स्थिति भी बनी। चक्काजाम के कारण हजारों यात्री घंटों तक सड़क पर फंसे रहे, जिससे आम लोगों को भी परेशानी का सामना करना पड़ा।

आंदोलन को लेकर प्रशासन पहले से सतर्क था। धार कलेक्टर भव्या मित्तल ने प्रदर्शन से पहले कहा था कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए पर्याप्त इंतजाम किए गए हैं। प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों से शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने की अपील भी की थी। हालांकि कई स्थानों पर स्थिति तनावपूर्ण बनी रही।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कहा कि आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण था और सुबह 11 बजे से दोपहर 3 बजे तक निर्धारित समय के भीतर ही प्रदर्शन किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार किसानों की समस्याओं को लगातार नजरअंदाज कर रही है। पटवारी ने चेतावनी दी कि यदि किसानों की मांगें जल्द नहीं मानी गईं, तो कांग्रेस पंचायत स्तर तक आंदोलन करेगी। उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ी तो मुख्यमंत्री आवास का घेराव कर तालाबंदी भी की जाएगी।

नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने खलघाट में चक्काजाम समाप्त होने के बाद सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि प्रदेश का किसान अपनी फसल सड़क पर फेंकने को मजबूर है, लेकिन सरकार किसानों की समस्याओं की बजाय राजनीति में व्यस्त है। सिंघार ने कहा कि किसान सब कुछ देख रहा है और आने वाले समय में इसका जवाब देगा। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार को किसानों की उपज और समस्याओं की चिंता नहीं है।

वहीं भाजपा ने इस आंदोलन को राजनीतिक स्टंट बताया। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि जिस दिन 10वीं और 12वीं की परीक्षाएं शुरू हो रही थीं, उसी दिन हाईवे जाम करना गैरजिम्मेदाराना कदम है। उन्होंने कहा कि इस आंदोलन से परीक्षा देने जा रहे छात्रों और आम जनता को भारी परेशानी हुई। मुख्यमंत्री ने कहा कि कांग्रेस को किसानों की चिंता कम और राजनीति ज्यादा है।

हालांकि आंदोलन ने एक बार फिर प्रदेश में किसानों की बदहाल स्थिति और कृषि संकट को प्रमुख मुद्दा बना दिया है। किसानों का कहना है कि यदि फसलों का उचित मूल्य, समय पर खरीदी, पर्याप्त खाद और नियमित बिजली आपूर्ति सुनिश्चित नहीं की गई, तो आने वाले समय में प्रदेशभर में और बड़े आंदोलन देखने को मिल सकते हैं।

खलघाट में हुआ यह चक्काजाम केवल सड़क पर बैठा प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह किसानों की उस पीड़ा की आवाज थी, जो लंबे समय से अपनी समस्याओं के समाधान की मांग कर रही है। अब देखने वाली बात होगी कि सरकार किसानों की मांगों पर क्या कदम उठाती है और यह आंदोलन आने वाले दिनों में किस दिशा में बढ़ता है।

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