”कृषि विभाग मध्य प्रदेश” बीज कानून पाठशाला – 37

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मध्य प्रदेश में बीज कानूनों के क्रियान्वयन पर सवाल, व्यापारियों ने उठाई कई विसंगतियाँ

हलधर किसान भोपाल। बीज कृषि का प्रधान आदान है और कृषि की उत्पादकता बीज की गणवत्ता पर अवलम्बित होती हैै। बीज की गुणवत्ता को नियमित करने हेतु भारत सरकार ने बीज अधिनियम 1966, बीज नियम 1968, बीज नियन्त्रण आदेश 1983 तथा भारतीय न्यूनतम बीज प्रमाणीकरण मानक 1965, 1970, 1988, 2013 एवं 2023 की रचना की हुई है।
बीज की गुणवत्ता बनाए रखने के लिये न कानूनों के तहत बीज निरीक्षक को असीम शक्तियाँ दी र्हइ है परन्तु बीज निरीक्षक एव अनुज्ञप्ती प्राधिकारी (Licensing Authority) इनकी व्याख्या अपने अनुसार करते हैं या कानूनों के बाहर जाकर नियमों को लागू करते हैं और कुछ विसंगतियाँ उत्पन्न हो जाती है उनमें से कुछ नीचे दी गई है –

1. लाइसैंस के लिये शैक्षणिक योग्यताः-

वर्ष 2015 में भारत सरकार ने कीटनाशी अधिनियम 1968 में कीटनाशी विक्रय हेतु अधिसूचना S.O. 2776E dt.10.10.2015 के द्वारा शैक्षणिक योग्यता निश्चित की। इसी प्रकारअधिसूचना 12B/2019/Bhopal/ दिनांक 29-01-2019 के द्वारा उर्वरक नियन्त्रण आदेश-1985 के तहत उर्वरक विक्रय कर्त्ता की न्यूनतम शैक्षणिक योब्यता रखी। बीज उद्योग मे ऐसी कोई व्यवस्था न होने पर कुछ अति उत्साही कृषि अधिकारियों जैसे उद्यान विभाग मध्य प्रदेश के प्रमुख सचिव उद्यान एव खाद्य प्रसंसकरण
वल्लभ भवन, भोपाल ने पत्र 12B/2019/Bhopal/ दिनांक 29.01.2019 द्वारा बीज विक्रेता हेतु कृषि स्नातक, कृषि डिप्लोमा प्रस्तुत करने का दबाव बनाया जो एक कुत्सित प्रयास है और न्यायालय में चुनौतीपूर्ण है। भारत सरकार के उपायुक्त (गु॰नि॰) डॉ॰ आर.के. त्रिवेदी ने अपने आदेश 13-3-2014 SD IV दिनांक 12.04.2016 के द्वारा बताया कि बीज विक्रय लाइसैंस लेने के लिये डीलर की कोई शैक्षणिक योग्यता निर्धारित नहीं है।

2. बीज विक्रय लाइसैंस की अवधिः-

भारत सरकार ने अपनी अधिसूचना GSR 593(E) dt. 21.08.2019 के द्वारा बीज विक्रय लाइसैस की अवधि तीन साल से बढ़ा कर 5 साल कर दी और इसे राज्य सरकारों ने तुरन्त लागू कर देनी चाहिए थी परन्तु उद्यान विभाग, मध्य प्रदेश ने इसके लिये पुनः राज्य की अधिसूचना 29.09.2023 को यानि 49 माह के बाद जारी की। केन्द्र सरकार के द्वारा पास किए गये कानून में छेड़छाड़ राज्य द्वारा अपराध है। पहले तो राज्य की अधिसूचना की आवश्यकता नहीं थी और किन्हीं कारणों से करनी भी थी तो 49 माह बाद क्यों ? राज्यों के बीज उत्पादकों, विक्रेताओं के हक को 49 माह बिना कारण दबाए रखा। ऐसे अधिकारियों को दण्ड क्यों न दिया जाए यह बीज उद्यमियों की अपने हकों के ज्ञान में कमी के कारण है।

3. कृषि एवं बागवानी लाइसैंस अलग-अलग नहीं:-

मध्य प्रदेश राज्य में कृषि और वानिकी विभाग अलग-अलग है और वे अलग-2 ही लाइसैंस जारी करते हैं जबकि मध्य प्रदेश शासन ने दिनांक 15.03.2000 की अधिसूचना संख्या B-14-3-XIV-2, A.K. Srivastava, Deputy Secretary के बिन्दु 6 में उद्यत किया कि “Licence of Seed need not to take seperate licence for Agriculture & Horticulture”. इतना
स्पष्ट संकेत होने पर भी बागवानी (सब्जी) तथा अन्य फसलो के बीज विक्रय लाइसैंस अलग-2 दिये जाते है यह बीज विक्रेताओ पर ज्यादती है। इतना ही नहीं भारत सरकार ने भी सूचना के अधिकार के तहत श्री रमन पाल उप्पल के पत्र दिनांक 18.02.2016 के उत्तर में दिनांक 25.02.2016 को सूचित किया है कि Horticulture & Agriculture Seeds बेचने
के लिए अलग-2 लाइसैंस नहीं है।

4. लाइसैंस नवीनीकरण :-

बीज नियन्त्रण आदेश 1983 के क्लॉज 7 में लाइसैंस नवीनीकरण के लियेप्रावधान है किः ”लाइसैंस नवीनीकृत कराने के लिये लाइसैंस कीExpiry Date से पूर्व प्रार्थना पत्र दे “ परन्तु मध्य प्रदेश सरकार ने केन्द्रीय कानून में अनाधिकृत छेड़छाड़ कर नई अधिसूचना 19.12.2006 को जारी कर आदेश दिया कि लाइसैंस नवीनीकरण के लिये लाइसैंस समाप्ति से एक माह पहले प्रार्थना पत्र दें। यह केन्द्रीय कानूनो का घोर उलघन है। मध्यप्रदेश सरकार ऐसे लाइसैंस नवीनीकरण प्रार्थना पत्र को निरस्त कर रही है जो अवधि समाप्त के एक माह पूर्व नहीं प्रस्तुत किए गये। ऐसा निरस्तीकरण न्यायालय में चुनौती पूर्ण है। यह मध्य प्रदेश सरकार की धक्के शाह नही तो और क्या है ?

5. सीड प्रोसेसिंग प्लान्ट सील करना:-

बीज कानून में बीज प्रमाणित कराना स्वैच्छिक है और बीजो का लेबलिंग (टी.एल. बीज बनाना) अनिवार्य है अर्थात कोई व्यक्ति प्रमाणित बीज बनाना चाहता है बनाए परन्तु उसे प्रमाणित बीज उत्पन्न करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता परन्तु बीजों का लेबलिंग करके बेचना अनिवार्य है। मध्य प्रदेश सरकार बीजों के लेबलिंग को हतोत्साहित करने हेतु उन प्रोसेसिंग प्लान्ट को जो मध्य प्रदेश राज्य बीज प्रमाणिकरण संस्था से पंजीकृत है को प्रमाणित वर्ग का बीज प्रोसेस होने के बाद कृषि विभाग एवं प्रमाणीकरण स्टाफ की संयुक्त कमेटी द्वारा सील कर दिये जाते हैं ताकि प्रोसेसिंग प्लान्ट धारक उस पर लेबल बीज न प्रोसेस
कर सके। अतः यह प्लान्ट सील करना कानून को धत्ता बताना है। इसका अर्थ है कि व्यापारी बिना लेबल करे बीज बेचे ? यदि लेबलिंग कानून विरूद्ध हो रहा है तो उसको सरकार नियन्त्रित करे।

6. दूसरे राज्य के उत्पादकों को लाइसैंस:-

श्री कमल पटेल, कृषि मन्त्री, मध्य प्रदेश द्वारा हरित मालव समाचार पत्र मे समाचार दिया कि बाहर की बीज कम्पनियाँ मध्य प्रदेश राज्य में बीज केवल लाइसैंस लेकर ही ब ेच सकेगी अन्यथा उनके विरूद्ध कार्यवाही की जाए। डॉ॰ आर.के. त्रिवेदी, उपायुक्त (गु॰नि॰) कृषि मन्त्रालय, भारत सरकार ने अपने पत्र क्रमसंक 13-49-2014 SD-IV Pt-I दिनांक 29.04.2016 में बताया कि दूसरे राज्य में यदि बीज कम्पनी अपना कार्यालय नहीं खोलती और ब्-थ् स्थापित नहीं करती और अपना बीज
उस राज्य के लाइसैंस शुदा बीज विक्रेताओं के माध्यम से बेचती है तो उस राज्य में लाइसैंस लेने की आवश्यकता नही है। आन्ध्रप्रदेश सरकार ने अपने पत्र SRC(2)01/2017 दिनाक 09.05.2017 के द्वारा अपने सभी अधिकारियों को सूचित किया हुआ है कि बाहर के राज्यों की बीज कम्पनियों को जो राज्य के अधिकृत बीज विक्रेताओं के माध्यम से बीज विक्रय कर रहे हैं उन्हें राज्य में नया लाइसैंस लेने के लिये दबाव न डाला जाए। उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने पत्र क्रमांक S.6/ /lkekU; i=ka@2017&18 दिनांक 22.06.2017 के द्वारा सूचित किया हुआ है कि ”बाहर के राज्यों की कम्पनियाँ अपना स्वयं का बिक्री
केन्द्र और स्टोर प्वाईंट न खोले और राज्य के अधिकृत विक्रेताओं के माध्यम से अपना बीज बिक्री करना चाहे तो उन्हें राज्य में लाइसैंस लेने के लिये बाध्य न किया जाए“। अतः युनियनों के माध्यम से कृषि निदेशक से मन्त्रणा कर इन विसंगतियों को हटवाएं।

7. हर जिले का लाइसैंस:-

वर्ष 2010 में मध्य प्रदेश सरकार ने आदेश जारी किये कि राज्य की एवं बाहरी राज्यों की बीज कम्पनियों को अपना बीज विक्रय करने हेतु प्रत्येक जिले में लासैंस लेना होगा परन्तु मध्य प्रदेश बीज एसोसियेशन ने याचिका 4970/2010 इन्दौर उच्च न्यायालय में दायर की और न्यायालय ने एसोसियेशन के हक में निर्णय दिया।

8. प्रिंसीपल सर्टिफिकेट:-

कृषि के तीन आदान बीज, कीटनाशक, उर्वरक है। उर्वरक तथा कीटनाशी लेने के लिये प्रिंसीपल प्रमाण पत्र तथा सोर्स सर्टिफिकेट की आवश्यकता होती है बीज विक्रय लाइसैंस लेने के लिये न अधिनियम में उल्लेख है और न ही प्रिंसीपल सर्टिफिकेट का प्रोफोर्मा है तब भी लाइसैंसिंग प्राधिकारी पूरा दबाव डालते हैं कि बीज उत्पादक एवं विक्रेता प्रिंसीपल
प्रमाण पत्र दे। प्रिंसीपल प्रमाण पत्र लाइसैंस लेने के लिए आवश्यक है परन्तु बीज कानूनों में लाइसैंस देने के बाद भी पिं्रसीपल सर्टिफिकेट की तलवार लटकती रहती है। मध्य प्रदेश सरकार ने पत्रांक BB बीज गु॰नि॰/2020-21/1073 दिनांक 23.10.2020 के द्वारा अधिकारियों को आदेश दिये कि प्रत्येक किस्म का प्रिंसीपल सर्टिफिकेट प्राप्त करें और न देने पर लाइसैंस ससैंड या कैन्सिल करें। बीज विक्रय लाइसैंस के लिये
बीज व्यापारियों के तर्क हैं कि:-
A – उच्च न्यायालय बैंगलोर नेW.P. No. 17652/1995, W.P. No. 19411-19435/1999 (25) 15.11.1999 का निर्णय देते हुए बताया कि बीज उत्पादकों को प्रिंसीपल प्रमाण पत्र देना आवश्यक नहीं है।
B – तेलंगाना न्यायालय का निर्णय – उच्च न्यायालय हैदराबाद ने W.P.18365/2016, D.O.D. 14.06.2016, सीडमैन एसोसियेशन, हैदराबाद एवं फॉरचून हाइब्रिड सीड्स, हैदराबाद बनाम तेलंगाना राज्य का निर्णय देते हुए बताया कि बीज लाइसैंस जारी करने के लिये प्रिंसीपल प्रमाण-पत्र आवश्यक नहीं है।
C – आन्ध्र प्रदेश शासन के आदेश – कमिश्नर एवं कृषि निदेशक, आन्ध्र प्रदेश ने आन्ध्र प्रदेश सीड ग्रोवर, मर्चेन्ट एवं नरसरीमैन एसोसियेशन हैदराबाद को पत्र Distt. S & HVP (4) 1428/94 दिनांक 25.09.1994 (32 साल पहले) को अधिकारियों को आदेश दिये हुए हैं कि नया लाइसैंस बनवाने एवं नवीनीकरण करवाने हेतु प्रिंसीपल प्रमाण-पत्र के लिये बाध्य न करें।
D – बिहार राज्य – धनंज्य प्रसाद त्रिपाटी – संयुक्त निदेशक कृषि ने दिनांक 12.02.2021 को सूचना दी कि बीज विक्रय लाइसैंस के लिये प्रिंसीपल प्रमाण-पत्र आवश्यक नहीं।
E – हिमाचल प्रदेश राज्य – हिमाचल प्रदेश सरकार ने लेखक की सलाह पर पत्र क्रमांक Agri.-II (S.P.)F(8)41-2018 Vol.-II दिनांक 04.05.2022 के द्वारा प्रिंसीपल प्रमाण-पत्र की मांग बीज विक्रय लाइसैंस के लिये वापिस ले ली है।
F – मध्य प्रदेश राज्य – मध्य प्रदेश सरकार ने जन सूचना के अधिकार के तहत पत्र क्रमांक सूचना का अधिकार /852/RBS/2024/150 दिनांक 02.02.2026 को सूचित किया है कि नये लाइसैंस एवं नवीनीकरण के लिये राज्य स्तर से प्रिंसीपल सर्टिफिकेट के लिए कोई अधिसूचना जारी नहीं की गई है।
G – भारत सरकार के कृषि मन्त्रालय के उपायुक्त श्री डी.एस. मिश्रा ने अपने पत्र दिनांक 07.06.2016 द्वारा सूचित किया हुआ है कि प्रिंसीपल प्रमाण पत्र लाइसैंस लेने के लिये अनिवार्यता नहीं है। अतः मध्य प्रदेश सरकार बीज व्यापारियों एवं बीज उत्पादकों का प्रिंसीपल प्रमाण-पत्र के लिये दोहन करती है। बीज व्यवहारी Seed Trader पिसते रहते हैं।

9. सैम्पल रिटैस्टिंग:-

बीज निरीक्षक द्वारा बीज की गुणवत्ता परख करने के लिये सैम्पल राज्य की लैब में भेजे जाते हैं उनके परिणाम अमानक आने पर निर्णायक Conclusive नही होते हैं जब तक उनकी पुष्टि बीज अधिनियम 1966 की धारा-16(2) के द्वारा केन्द्रीय बीज परिक्षणशाला वाराणसी से न हो। राजस्थान राज्य के बीज निरीक्षक बीज व्यवहारियों को विधिवत रूप से पूछते हैं कि वे अपने फेल लॉट के परिणाम की पुष्टि केन्द्रीय परिक्षणशाला से कराना चाहते हैं क्या ? परन्तु मध्य प्रदेश के अधिकारी बीज नियन्त्रण आदेश 1983 की धारा-15(b) के आदेश का उलंघन हुआ मानकर मनमाने रूप से लाइसैंस निरस्त कर देते हैं। वास्तव में मध्य
प्रदेश के बीज निरीक्षक लॉट का अंकुरण, भौतिक शुद्धता, अनुवांशिक शुद्धता में फेल होना बीज नियन्त्रण आदेश-1983 का उलंघन मानते हैं। फसलों के बीजों के न्यूनतम मानक जिनके आधार पर लॉट फेल है या पास बीज नियन्त्रण आदेश 1983 में नहीं है और न ही बीज नियन्त्रण आदेश 1983 की माँ आवश्यक आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 में है। बीज लॉट के मानक बीज अधिनियम 1966 के अन्तर्गत है इसलिये बीज लॉट का फेल आना बीज अधिनियम 1966 का उलंघन है तो उस पर विवेचना भी बीज अधिनियम 1966 के तहत ही धारा-16(2) के द्वारा सैम्पल पुनः परिक्षण का प्रावधान है। बीज निरीक्षकों के सामने कानून कुछ भी हो परन्तु उन्हें व्यापारी का लाइसैंस निरस्त कर उसका दोहन करने में भी अधिक सन्तुष्टि होती है।

10. ग्रो आऊट टैस्ट:-

बीज व्यापारियों द्वारा बीज विक्रय पूर्व बीजो की अनुवांशिक शुद्धता (Genetic Purity) जांचने तथा परवर्तन विभाग कृषि Law Enforcement Deptt. of M.P. Agriculture द्वारा GOT द्वारा पुष्टि करती है। मध्य प्रदेश में अभी तक कोई GOT फार्म अधिसूचित ही नहीं है। साथ ही GOT Seed Analyst भी अधिसूचित नहीं है। इसके अलावा क्छDNA Finger Printing Electrophorasis, ELISA Test अभी तक मध्य प्रदेश सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है और न ही कोई परिक्षणशाला अभी तक अधिसूचित है। यह सूचना जन सूचना अधिकार के अन्तर्गत पत्र क्रमांक सूचना का अधि /852/RBS/2024/150 दिनाक 02.02.2026 द्वारा प्राप्त हुई।

11. अधिसूचित बीज परिक्षक नहीं:-

मध्य प्रदेश राज्य में लगभग 12 बीज परिक्षण शालाएं हैं और उनमें परिक्षण हेतु बीज अधिनियम 1966 की धारा-12 के अनुसार बीज परिक्षक मध्य प्रदेश सरकार द्वारा अधिसूचित होना चाहिए परन्तु मध्य प्रदेश कृषि निदेशालय से जन सूचना के अधिकार के अन्तर्गत/सूचित किया है कि अभी 59 सालों तक किसी भी लैब मे धारा-12 के अनुसार बीज विश्लेषक अधिसूचित नहीं। अतः बीज व्यापारी अपने केस में यह दलील देकर लैब के परिणाम को न्यायालय मे चुनौती दे सकते हैं।

12. सीड टोलरैन्स:-

कीटनाशी रसायन, उर्वरक की तरह बीज में भी टोलरैंस का प्रावधान है। कृषि अधिकारी इसका लाभ व्यापारियों को नहीं देते है और बीज व्यापारी को इसका ज्ञान नहीं है। महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश सरकार ने लैब की रिपोर्ट में ही सहानशीलता Tolerance का प्रावधान किया हुआ है और Seed Analyst ही Tolerance का लाभ देकर परिणाम देता है। मध्य प्रदेश की Labs में ऐसा नहीं है तो बीज निरीक्षक भी यह लाभ नहीं देता है। अतः व्यापारियों को स्वयं लाभ लेना चाहिए। जिसका तरीका निम्न है :-
फसल का न्यूनतम
अंकुरण मानक:
रिपोर्ट में
अंकुरण
टोलरैन्स अंक मान्य

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    इसी प्रकार भौतिक शुद्धता तथा फौरन मैटीरियल में भीSeed Testing Manual की सारणी-10 ABC है जिन से मिलान कर आप अपना लॉट बचा सकते हो।
    यहाँ यह उल्लेख करना आवश्यक है कि निदेशक कृषि मध्य प्रदेश ने कृषि मन्त्रालय भारत सरकार से अपने पत्र संख्या E-1-B/
    बीज /QC/2016/03 दिनांक 01.02.2017 के द्वारा टोलरैंस बारे जानकारी भी कर ली और केन्द्र सरकार के उपायुक्त श्री डी.एस. मिश्रा ने अपने पत्र दिनांक 17.02.2017 के द्वारा उन्हें ग्वार फसल का उदाहरण देकर समझा दिया है। लगता है यह सूचना कृषि निदेशक ने जिला, तहसील स्तर तक नही पहुंचाई है इसलिये नीचे के अधिकारी इस बारे अनभिज्ञता जताते हैं
    और बीज व्यवहारियों को Tolerance का लाभ नहीं दे पाते हैं।

    कृषि आदान विक्रेता संघ भोपाल (मध्य प्रदेश) के प्रदेश उपाध्यक्ष श्री कृष्णा दुबे की प्रतिक्रिया

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    प्रदेश के कृषि विभाग से संबंधित नियमों और प्रक्रियाओं में अभी भी कई ऐसी कमियाँ हैं, जिनकी जानकारी अधिकांश बीज विक्रेताओं, बीज उत्पादकों तथा बीज का विक्रय करने वाली कंपनियों को नहीं है। इस लेख के माध्यम से इन महत्वपूर्ण विषयों को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। अक्सर यह देखा जाता है कि यदि किसी कारणवश बीज का नमूना (सैंपल) फेल हो जाता है, तो सीड टॉलरेंस (Seed Tolerance) का जो प्रावधान नियमों में उपलब्ध है, उसकी जानकारी न तो विभाग द्वारा विक्रेताओं को दी जाती है और न ही कंपनियों एवं उत्पादकों को सही तरीके से समझाई जाती है। परिणामस्वरूप कई व्यापारी और संबंधित लोग अनावश्यक रूप से परेशान होते हैं। इसके साथ ही एक ही विभाग से दो अलग-अलग लाइसेंस लेने की प्रक्रिया, जैसे कृषि और बागवानी के लिए अलग-अलग लाइसेंस की व्यवस्था, इस विषय पर भी लेख में विस्तार से प्रकाश डाला गया है। इन सभी बिंदुओं से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण जानकारियाँ इस सामग्री में दी गई हैं, जिन्हें सभी विक्रेताओं, उत्पादकों और कंपनियों को ध्यानपूर्वक पढ़ना और समझना चाहिए, ताकि व्यापार में आने वाली कठिनाइयों और परेशानियों से बचा जा सके। हम मध्य प्रदेश के कृषि संचालक महोदय तथा प्रदेश के सभी जिलों के उपसंचालक कृषि से भी विनम्र निवेदन करते हैं कि इन विषयों को गंभीरता से समझें और संबंधित विक्रेताओं, उत्पादकों एवं कंपनियों को सही मार्गदर्शन प्रदान करें। कई बार जानकारी के अभाव में बीज विक्रेताओं को अनावश्यक परेशानियों का सामना करना पड़ता है, जिससे उन्हें आर्थिक एवं व्यापारिक नुकसान भी उठाना पड़ता है।

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    लेखक- आर.बी. सिंह, बीज कानून रत्न, एरिया मैनेजर (सेवानिवृत) नेशनल सीड्स कारपोरेशन लि० (भारत सरकार का संस्थान) सम्प्रति “कला निकेतन”, ई-70, विथिका-11, जवाहर नगर, हिसार-125001 (हरियाणा), दूरभाष सम्पर्क-79883-04770, 94667-46625 (WhatsApp)

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