जलवायु परिवर्तन से किसानों की सुरक्षा के लिए सरकार की बड़ी पहल

Governments major initiative to protect farmers from climate change

हलधर किसान नई दिल्ली। देश में बढ़ते जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को देखते हुए किसानों की सुरक्षा और कृषि को स्थिर बनाए रखने के लिए केंद्र सरकार ने कई व्यापक और बहुआयामी रणनीतियां लागू की हैं। इन प्रयासों का मुख्य उद्देश्य किसानों की आय को सुरक्षित रखना और उन्हें बदलते मौसम के अनुसार खेती के लिए सक्षम बनाना है।

सरकार भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के माध्यम से “जलवायु परिवर्तन के अनुकूल कृषि में राष्ट्रीय नवाचार” (एनआईसीआरए) परियोजना संचालित कर रही है। इस परियोजना के तहत देश के 651 कृषि जिलों का वैज्ञानिक आकलन किया गया, जिसमें 310 जिलों को जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील पाया गया। इनमें से 109 जिलों को ‘अत्यंत उच्च’ और 201 जिलों को ‘उच्च’ संवेदनशीलता श्रेणी में रखा गया है।

इन चुनौतियों से निपटने के लिए प्रत्येक जिले के लिए “जिला कृषि आकस्मिक योजना” (डीएसीपी) तैयार की गई है। इन योजनाओं के जरिए किसानों को मौसम की अनिश्चितताओं—जैसे सूखा, बाढ़ और तापमान में बदलाव—से निपटने के लिए स्थानीय स्तर पर उपयुक्त फसलें, किस्में और खेती की तकनीकें सुझाई जाती हैं।

एनआईसीआरए के अंतर्गत देशभर के 151 संवेदनशील जिलों में 448 “जलवायु-सहनशील मॉडल गांव” विकसित किए गए हैं। इन गांवों में कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) के माध्यम से उन्नत तकनीकों का प्रदर्शन किया गया है। इनमें धान की सीधी बुवाई, सघन धान प्रणाली, सूखा और गर्मी सहनशील किस्मों का उपयोग जैसी तकनीकें शामिल हैं, जो किसानों को कम संसाधनों में बेहतर उत्पादन देने में मदद करती हैं।

ग्राम स्तर पर बीज बैंक और सामुदायिक नर्सरी की स्थापना भी इस योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इससे किसानों को समय पर गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध हो सके। कई गांवों में धान, गेहूं, सोयाबीन, सरसों, चना और बाजरा जैसी फसलों की जलवायु-सहनशील किस्मों का सफल प्रदर्शन किया गया है।

सरकार किसानों को प्रशिक्षण देने पर भी विशेष जोर दे रही है। कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी (एटीएमए) के तहत किसानों को आधुनिक खेती, जल प्रबंधन और जोखिम कम करने की तकनीकों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसके अलावा छोटे और सीमांत किसानों को तकनीकी सहायता भी प्रदान की जा रही है।

आईसीएआर ने 2014 से 2024 के बीच 2,900 नई फसल किस्में विकसित की हैं, जिनमें से 2,661 किस्में सूखा, बाढ़, कीट एवं रोग जैसी प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन करने में सक्षम हैं। यह पहल भविष्य की कृषि को अधिक सुरक्षित और टिकाऊ बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

जल प्रबंधन के क्षेत्र में ‘प्रति बूंद अधिक फसल’ योजना के तहत ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे पानी की बचत के साथ उत्पादन में वृद्धि हो रही है। वहीं वर्षा आधारित क्षेत्र विकास योजना के माध्यम से एकीकृत कृषि प्रणाली को अपनाने पर जोर दिया जा रहा है, जिससे किसानों की आय के स्रोत बढ़ते हैं और जोखिम कम होता है।

मृदा स्वास्थ्य एवं उर्वरता योजना के जरिए संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके साथ ही परंपरागत कृषि विकास योजना और प्राकृतिक खेती मिशन के माध्यम से जैविक एवं प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहन मिल रहा है। दलहन, तिलहन और बागवानी मिशनों के जरिए फसल विविधीकरण को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।

किसानों को आर्थिक सुरक्षा देने के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। यह योजना प्राकृतिक आपदाओं और प्रतिकूल मौसम के कारण फसल नुकसान होने पर किसानों को वित्तीय सहायता प्रदान करती है। वर्ष 2016 से 31 दिसंबर 2025 तक इस योजना के तहत किसानों को कुल 1.92 लाख करोड़ रुपये के दावों का भुगतान किया जा चुका है।

कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने राज्यसभा में जानकारी देते हुए बताया कि सरकार का लक्ष्य जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करते हुए किसानों को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाना है।

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