खरगोन, निमाड़। राजस्थान से बड़ी संख्या में जिले में आने वाली भेड़ों के झुंडों को लेकर निमाड़ क्षेत्र के पशुपालकों में नाराजगी बढ़ती जा रही है। स्थानीय पशुपालकों ने वर्षाकाल के बाद राजस्थान से जिले में प्रवेश करने वाली भेड़ों के झुंडों पर रोक लगाने की मांग को लेकर प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया है। इस संबंध में पशुपालकों के एक प्रतिनिधिमंडल ने अपर कलेक्टर श्रीमती रेखा राठौर को ज्ञापन सौंपकर मामले में सख्त कार्रवाई की मांग की।
पशुपालकों का कहना है कि राजस्थान से बड़ी संख्या में चरवाहे हजारों भेड़ों के झुंड लेकर निमाड़ क्षेत्र में पहुंचते हैं और कथित तौर पर बिना प्रशासनिक अनुमति के स्थानीय चरनोई भूमि एवं अन्य सार्वजनिक स्थानों पर अपनी भेड़ों को चराते हैं। इससे क्षेत्र के स्थानीय पशुपालकों के सामने अपने गोवंश और अन्य पशुओं के लिए हरे चारे की समस्या खड़ी हो जाती है।
पशुपालकों ने प्रशासन को दिए ज्ञापन में बताया कि राजस्थान से आने वाले भेड़ों के झुंडों की संख्या कई बार इतनी अधिक होती है कि किसी भी मैदान या चरनोई भूमि में उगी हरी घास को कुछ ही घंटों में भेड़ें चर जाती हैं। इससे स्थानीय पशुपालकों के पशुओं के लिए पर्याप्त चारा उपलब्ध नहीं रह पाता। ग्रामीण क्षेत्रों में पहले से ही पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। ऐसे में बाहर से आने वाले बड़े झुंडों के कारण स्थानीय पशुपालकों की परेशानी और बढ़ जाती है।
स्थानीय पशुपालकों और चरवाहों के बीच विवाद की स्थिति
पशुपालकों का आरोप है कि जब स्थानीय लोग राजस्थान से आने वाले चरवाहों को अपनी चरनोई भूमि पर भेड़ें चराने से रोकते हैं, तो कई बार विवाद की स्थिति बन जाती है। पशुपालकों ने ज्ञापन में दावा किया कि पूर्व में भी इस तरह के विवादों के दौरान मारपीट की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। उनका कहना है कि यदि समय रहते प्रशासन ने इस मामले में ठोस व्यवस्था नहीं बनाई तो भविष्य में विवाद और बढ़ सकते हैं।
स्थानीय पशुपालकों के अनुसार, बड़ी संख्या में भेड़ों के आने से जिले के स्थानीय मवेशियों के लिए चारा कम पड़ जाता है। इसके चलते पशुपालकों को अपने पशुओं के लिए बाजार से महंगा चारा खरीदना पड़ता है। इससे पशुपालन की लागत बढ़ने के साथ ही किसानों और पशुपालकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है।
खरपतवारों के फैलाव को लेकर भी जताई चिंता
पशुपालकों ने राजस्थान से आने वाली भेड़ों के झुंडों के कारण क्षेत्र में खरपतवारों के तेजी से फैलने की आशंका भी जताई है। उनका कहना है कि भेड़ों के चरने और एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने के दौरान उनके मल के माध्यम से विभिन्न खरपतवारों के बीज नई जगहों तक पहुंचते हैं। इससे चरनोई भूमि के साथ-साथ खेती की जमीन में भी खरपतवार फैलने की समस्या बढ़ सकती है।
पशुपालकों ने बताया कि क्षेत्र में गाजरघास, चरोटा, विलायती बबूल और सफेद फूल वाले चारे सहित कई प्रकार के खरपतवार पहले से मौजूद हैं। इन खरपतवारों के तेजी से फैलने के कारण चरनोई भूमि पर उपयोगी घास का विकास प्रभावित होता है। वहीं, किसानों को अपने खेतों से इन खरपतवारों को हटाने के लिए अतिरिक्त श्रम और पैसा खर्च करना पड़ता है।
पशुपालकों का कहना है कि यदि बड़ी संख्या में बाहर से आने वाले पशुओं के झुंडों के आवागमन को नियंत्रित नहीं किया गया तो आने वाले समय में यह समस्या और गंभीर हो सकती है। उन्होंने प्रशासन से मांग की कि जिले की चरनोई भूमि और स्थानीय पशुओं के चारे की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए बाहरी पशु झुंडों के प्रवेश और चराई के लिए स्पष्ट नियम बनाए जाएं।
सड़कों पर झुंड से यातायात भी प्रभावित
पशुपालकों ने राजस्थान से आने वाले भेड़ों के बड़े-बड़े झुंडों के सड़कों पर आवागमन को लेकर भी चिंता जाहिर की है। उनका कहना है कि जब हजारों की संख्या में भेड़ों को लेकर चरवाहे एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर जाते हैं तो कई बार सड़क पर लंबा जाम लग जाता है। इससे आम लोगों को आवागमन में परेशानी का सामना करना पड़ता है।
पशुपालकों के अनुसार, सड़कों पर भेड़ों के बड़े झुंड के चलते वाहन चालकों को भी काफी परेशानी होती है। कई बार अचानक सड़क पर भेड़ों के आ जाने से दुर्घटना की स्थिति बन जाती है। उनका दावा है कि भेड़ों के झुंडों के कारण क्षेत्र में कई दुर्घटनाएं भी हो चुकी हैं। ऐसे में इस पूरे मामले को केवल पशु चराई से जुड़ा विषय न मानकर यातायात और जनसुरक्षा से भी जोड़कर देखा जाना चाहिए।
प्रशासन से सख्त कार्रवाई की मांग
निमाड़ क्षेत्र के पशुपालकों ने अपर कलेक्टर श्रीमती रेखा राठौर को ज्ञापन सौंपकर मांग की है कि वर्षाकाल समाप्त होने के बाद राजस्थान से जिले में आने वाले भेड़ों के बड़े झुंडों के प्रवेश पर प्रभावी रोक लगाई जाए। साथ ही, यदि किसी बाहरी पशुपालक को जिले में पशु चराने की अनुमति दी जाती है तो उसके लिए प्रशासनिक अनुमति, निर्धारित चराई क्षेत्र और अन्य आवश्यक नियम तय किए जाएं।
पशुपालकों ने कहा कि स्थानीय चरनोई भूमि पर पहला अधिकार क्षेत्र के स्थानीय पशुपालकों और उनके पशुओं का होना चाहिए। प्रशासन को इस मामले में समय रहते उचित निर्णय लेना चाहिए, ताकि स्थानीय पशुपालकों को चारे की समस्या से राहत मिल सके और भविष्य में विवाद, खरपतवारों के फैलाव तथा सड़क दुर्घटनाओं जैसी समस्याओं पर भी प्रभावी नियंत्रण किया जा सके।
अब पशुपालकों की नजर प्रशासन की आगामी कार्रवाई पर है। यदि प्रशासन इस मामले में कोई ठोस निर्णय लेता है तो इससे निमाड़ क्षेत्र के स्थानीय पशुपालकों को राहत मिलने की उम्मीद है।
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