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इस साल बाजारों में जामुन की भरपूर आवक, क्या यह सूखे का संकेत है? जानिए विज्ञान क्या कहता है

Abundant arrival of Jamun in markets this year—is it a sign of drought Find out what science says

हलधर किसान भोपाल। इन दिनों देशभर के बाजारों में गहरे बैंगनी रंग के जामुन की भरपूर आवक देखने को मिल रही है। शहरों से लेकर गांवों तक सड़क किनारे जामुन की दुकानें सजी हुई हैं और पेड़ों पर भी इस वर्ष फलों की संख्या पिछले वर्षों की तुलना में काफी अधिक दिखाई दे रही है। जामुन की इस बंपर पैदावार के बीच सोशल मीडिया पर एक पुरानी कहावत फिर चर्चा में आ गई है कि “जिस वर्ष जामुन अधिक फलता है, उस वर्ष सूखे की संभावना बढ़ जाती है।” ऐसे में किसानों और आम लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या वास्तव में जामुन की भरपूर फसल आने वाले सूखे का संकेत है या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण है?

विशेषज्ञों के अनुसार जामुन की अधिक पैदावार का संबंध भविष्य में पड़ने वाले सूखे से नहीं, बल्कि बीते मौसम की परिस्थितियों से जुड़ा होता है। जामुन का पेड़ सामान्यतः मार्च और अप्रैल महीने में फूल देता है। इस दौरान पेड़ों पर छोटे-छोटे सफेद सुगंधित फूलों के गुच्छे निकलते हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में “बौर” कहा जाता है। यही बौर बाद में फल का रूप लेते हैं।

वनस्पति वैज्ञानिक बताते हैं कि जामुन की अच्छी फसल के लिए फूल आने के समय शुष्क मौसम सबसे अनुकूल माना जाता है। यदि इस अवधि में अधिक वर्षा हो जाए तो फूल झड़ जाते हैं और फल बनने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। इसके विपरीत यदि मौसम सूखा रहे और बारिश न हो तो अधिक संख्या में फूल सुरक्षित रहते हैं, जिससे फल उत्पादन बढ़ जाता है।

वर्ष 2026 में देश के कई हिस्सों में प्री-मॉनसून अवधि अपेक्षाकृत शुष्क रही। मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में जून के शुरुआती दिनों में सामान्य से काफी कम वर्षा दर्ज की गई। अरब सागर क्षेत्र में मानसूनी गतिविधियों की धीमी प्रगति के कारण भी कई इलाकों में लंबे समय तक सूखे जैसी स्थिति बनी रही। हालांकि यह स्थिति किसानों की चिंता का कारण बनी, लेकिन जामुन के पेड़ों के लिए यह मौसम काफी अनुकूल साबित हुआ। फूलों के झड़ने की संभावना कम रही और बड़ी संख्या में फल विकसित हो सके।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे कुछ दावों में कहा जा रहा है कि जामुन का पेड़ भूजल स्तर में गिरावट या संभावित सूखे का आभास कर अपनी पूरी ऊर्जा फल उत्पादन में लगा देता है। इस तर्क को “स्ट्रेस फ्रूटिंग” से जोड़ा जाता है। वनस्पति विज्ञान में स्ट्रेस फ्रूटिंग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें कुछ पौधे प्रतिकूल परिस्थितियों, विशेष रूप से जल की कमी, के दौरान अपनी वृद्धि को सीमित कर प्रजनन यानी बीज और फल उत्पादन पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं।

विशेषज्ञ मानते हैं कि सीमित स्तर पर यह सिद्धांत कुछ पौधों में देखने को मिलता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि पेड़ भविष्य के मौसम की सटीक भविष्यवाणी कर सकते हैं। जामुन के पेड़ों पर इस वर्ष अधिक फल लगने का मुख्य कारण फूल आने के दौरान अनुकूल और शुष्क मौसम रहा है। इसे आगामी महीनों में सूखा पड़ने का संकेत मानना वैज्ञानिक दृष्टि से सही नहीं माना जाता।

वनस्पति वैज्ञानिकों का कहना है कि इस वर्ष जामुन की भरपूर फसल वास्तव में बीते वसंत ऋतु की सूखी परिस्थितियों का परिणाम है। पेड़ों पर अधिक संख्या में बौर टिके रहने से फल उत्पादन बढ़ा है। यह घटना मौसम और पौधों की जैविक प्रतिक्रिया का परिणाम है, न कि भविष्य में होने वाली वर्षा या सूखे की भविष्यवाणी।

कृषि विशेषज्ञ किसानों को सलाह देते हैं कि वे सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाली अपुष्ट जानकारियों के आधार पर निर्णय लेने के बजाय भारतीय मौसम विज्ञान विभाग और कृषि वैज्ञानिकों द्वारा जारी आधिकारिक पूर्वानुमानों पर भरोसा करें। मानसून की स्थिति का आकलन समुद्री तापमान, वायुमंडलीय दबाव, हवाओं की दिशा और अन्य वैज्ञानिक संकेतकों के आधार पर किया जाता है, न कि किसी एक फलदार वृक्ष की पैदावार से।

कुल मिलाकर, इस वर्ष बाजारों में जामुन की भरमार निश्चित रूप से अच्छी खबर है, लेकिन इसे आने वाले सूखे का संकेत मानना उचित नहीं होगा। वैज्ञानिक दृष्टिकोण यही बताता है कि जामुन की बंपर फसल अनुकूल फूलन अवधि और शुष्क मौसम का परिणाम है। इसलिए किसानों को अफवाहों से दूर रहकर मौसम संबंधी विश्वसनीय सूचनाओं के आधार पर अपनी कृषि योजनाएं बनानी चाहिए।

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