तीन कृषि आदान विक्रेताओं का स्टॉक जब्त, बिक्री पर रोक; प्रदेशभर के डीलरों में बढ़ी चिंता
हलधर किसान हरदा/खंडवा। मध्यप्रदेश में कृषि आदान विक्रेताओं के बीच इन दिनों फॉर्म-ओ और उर्वरक बिक्री अनुमति को लेकर चिंता बढ़ गई है। खंडवा के बाद अब हरदा जिले में भी बिना फॉर्म-ओ के बीएएसएफ कंपनी के कुछ माइक्रोन्यूट्रिएंट एवं अन्य कृषि उत्पादों की सप्लाई और बिक्री का मामला सामने आया है। कृषि विभाग ने हरदा जिले में तीन विक्रेताओं के यहां कार्रवाई करते हुए संबंधित उत्पादों का स्टॉक जब्त कर उनकी बिक्री पर रोक लगा दी है। वहीं खंडवा में भी एक विक्रेता के यहां बिना फॉर्म-ओ के बीएएसएफ के उत्पाद पाए जाने के बाद स्टॉक प्रतिबंधित किया गया है।
मामला सामने आने के बाद प्रदेशभर के कृषि आदान व्यापारियों में हड़कंप की स्थिति है। व्यापारियों का कहना है कि यदि कंपनी की ओर से आवश्यक दस्तावेज और बिक्री अनुमति के बिना माल सप्लाई किया गया है, तो उसकी जिम्मेदारी कंपनी की भी तय होनी चाहिए। दूसरी ओर कृषि विभाग द्वारा नियमों के अनुसार कार्रवाई की बात कही जा रही है।
हरदा में तीन दुकानों पर कार्रवाई
हरदा जिले में कृषि विभाग की जांच के दौरान बीएएसएफ कंपनी के प्रिवान और लिब्रेल टीएमएक्स-2 सहित संबंधित उत्पादों का स्टॉक पाया गया। विभाग ने इन उत्पादों के स्टॉक को जब्त करते हुए बिक्री पर रोक लगा दी।
जानकारी के अनुसार मेसर्स किसान सहकार, हरदा की जांच में बीएएसएफ कंपनी का लिब्रेल टीएमएक्स-2 उत्पाद पाया गया। बताया गया कि कंपनी द्वारा जुलाई माह में उत्पाद की सप्लाई की गई थी, लेकिन उसके लिए आवश्यक फॉर्म-ओ उपलब्ध नहीं था और विक्रेता के उर्वरक लाइसेंस में भी संबंधित फॉर्म-ओ दर्ज नहीं था। जांच के दौरान 5 किलोग्राम के 10 पैकेट तथा 250 ग्राम के 30 पाउच पाए गए।
इसी तरह टिमरनी क्षेत्र की मेसर्स दोगने सीड्स एंड एग्रीटेक की जांच में लगभग 350 लीटर प्रिवान तथा टीएमएक्स-2 का स्टॉक मिला। इसमें प्रिवान के एक लीटर के 310 पैक और 500 एमएल के 49 पैक, जबकि लिब्रेल टीएमएक्स-2 के 1 किलोग्राम के 45 पैकेट और 250 ग्राम के 12 पैकेट शामिल बताए गए हैं।
इसके अलावा मेसर्स आदित्य इंटरप्राइजेस से लगभग 310 लीटर प्रिवान जब्त किया गया। कृषि विभाग ने जब्त स्टॉक की बिक्री पर तत्काल रोक लगा दी है। अधिकारियों के अनुसार मामले में आगे नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
खंडवा में भी सामने आया मामला
हरदा से पहले खंडवा जिले में भी इसी तरह की कार्रवाई हो चुकी है। कृषि विभाग ने मेसर्स वाहे गुरु कृषि सेवा केंद्र की जांच की थी। जांच में बीएएसएफ इंडिया लिमिटेड के प्रिवान के लगभग 400 लीटर तथा लिब्रेल के 40 किलोग्राम पैकेट बिना फॉर्म-ओ के पाए गए।
विभाग ने संबंधित स्टॉक की बिक्री प्रतिबंधित कर दी तथा आगे की कार्रवाई के लिए इंदौर के उप संचालक कृषि (डीडीए) को पत्र लिखा है। खंडवा मामले में कंपनी द्वारा आवश्यक अनुमति के बिना डीलर को उत्पाद उपलब्ध कराने के आरोपों की भी जांच की मांग की गई है।
क्या है फॉर्म-ओ?
उर्वरक व्यापार में फॉर्म-ओ एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। उर्वरक नियंत्रण आदेश (FCO), 1985 के तहत यह निर्माता अथवा अधिकृत स्रोत द्वारा खुदरा विक्रेता को उर्वरक की आपूर्ति के संबंध में आवश्यक प्रमाण-पत्र के रूप में उपयोग किया जाता है।
जब कोई कृषि आदान विक्रेता अपने उर्वरक लाइसेंस में किसी नई कंपनी के उत्पाद को शामिल करना चाहता है, तो संबंधित कंपनी या अधिकृत स्रोत से आवश्यक दस्तावेज प्राप्त कर उसे कृषि विभाग की प्रक्रिया के अनुसार दर्ज कराया जाता है। इसके बाद ही संबंधित उत्पादों का वैधानिक रूप से व्यापार किया जाना चाहिए। उत्पादों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए विभाग द्वारा नमूने लिए जाने की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण है।
गलती कंपनी की या डीलर की?
कृषि आदान व्यापारियों के बीच इस मामले को लेकर मुख्य सवाल यही है कि यदि कंपनी ने फॉर्म-ओ जारी किए बिना माल भेज दिया, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?
व्यापारियों के अनुसार तीन परिस्थितियां बन सकती हैं। पहली स्थिति में कंपनी ने फॉर्म-ओ जारी कर माल भेज दिया, लेकिन विक्रेता ने उसे अपने उर्वरक लाइसेंस में दर्ज नहीं कराया। ऐसी स्थिति में विक्रेता की जिम्मेदारी बनती है।
दूसरी स्थिति में कंपनी ने पहले माल भेज दिया और फॉर्म-ओ जारी ही नहीं किया। ऐसी स्थिति में कंपनी की भूमिका और जिम्मेदारी की जांच आवश्यक है। तीसरी स्थिति में यदि ऐसे व्यक्ति या संस्था को माल सप्लाई किया गया जिसके पास वैध उर्वरक फुटकर लाइसेंस ही नहीं है, तो इसमें भी कंपनी की जिम्मेदारी की जांच होना चाहिए।
कंपनी के अधिकारी अब डीलरों तक पहुंचा रहे फॉर्म-ओ
मामला सामने आने के बाद कंपनी के अधिकारी संबंधित डीलरों के पास फॉर्म-ओ लेकर पहुंच रहे हैं। हालांकि व्यापारियों का कहना है कि बाद में दस्तावेज उपलब्ध कराने से पुरानी तारीख में हुई सप्लाई की वैधानिक स्थिति स्वतः स्पष्ट नहीं हो जाती। यदि उत्पाद पहले ही विक्रेता को उपलब्ध करा दिया गया था और उस समय आवश्यक अनुमति या दस्तावेज उपलब्ध नहीं थे, तो इसकी जिम्मेदारी तय करने की जरूरत है।
कृषि आदान संगठन ने विभाग से सहयोगात्मक रवैया अपनाने की अपील की
इस पूरे मामले को लेकर कृषि आदान व्यापारियों के संगठन ने कृषि विभाग से सहयोगात्मक रवैया अपनाने की अपील की है।
संगठन के प्रदेश अध्यक्ष श्री मानसिंह जी राजपूत, राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं प्रदेश सचिव श्री संजय रघुवंशी तथा उपाध्यक्ष श्री कृष्णा दुबे ने कहा कि फॉर्म-ओ और वैधानिक अनुमति की प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है, लेकिन यदि कंपनी स्तर पर दस्तावेजी प्रक्रिया में चूक हुई है तो उसका पूरा खामियाजा कृषि आदान व्यापारियों को नहीं भुगतना चाहिए।
उन्होंने कहा कि सीजन शुरू होने के दौरान जल्दबाजी में कई बार दस्तावेजी प्रक्रियाओं में छोटी-मोटी गलतियां हो जाती हैं। ऐसे मामलों में विभाग, कंपनी और कृषि आदान व्यापारियों के बीच समन्वय बनाकर समाधान निकाला जाना चाहिए।
संगठन ने यह भी कहा कि इस समय प्रदेश में बारिश की स्थिति कई क्षेत्रों में संतोषजनक नहीं है। किसान अपनी फसलों को लेकर चिंतित हैं, वहीं कृषि आदान व्यापारियों के पास भी लाखों रुपये का स्टॉक पड़ा हुआ है। ऐसे समय में व्यापारियों को अनावश्यक रूप से परेशान करने के बजाय वास्तविक दोष और जिम्मेदारी तय करते हुए नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
व्यापारियों के लिए जरूरी सावधानी
इस मामले के बाद कृषि आदान विक्रेताओं के लिए यह संदेश स्पष्ट है कि बिना वैधानिक अनुमति, फॉर्म-ओ अथवा संबंधित दस्तावेजों की जांच किए किसी भी कंपनी के उर्वरक या माइक्रोन्यूट्रिएंट का व्यापार नहीं करना चाहिए। माल प्राप्त करने से पहले कंपनी से आवश्यक दस्तावेज लेना, अपने उर्वरक लाइसेंस में संबंधित उत्पाद दर्ज कराना और सभी रिकॉर्ड सुरक्षित रखना व्यापारियों के लिए बेहद जरूरी है।
अब देखना यह होगा कि हरदा और खंडवा में हुई कार्रवाई के बाद जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है और क्या केवल विक्रेताओं की जिम्मेदारी तय होती है अथवा बिना आवश्यक बिक्री अनुमति के उत्पाद सप्लाई करने वाली कंपनी की भूमिका की भी विस्तृत जांच की जाती है।
यह भी पढेंः- एथेनॉल पर किसानों की एकजुट आवाज, शिवराज बोले- किसान ही नीति का केंद्र, कृषि भवन के दरवाजे हमेशा खुले
