हलधर किसान, अजमेर | रंगों का पर्व होली इस वर्ष ग्रहण के कारण विशेष चर्चा में है। गत वर्षों में भद्रा के साये को लेकर होलिका दहन और धुलेंडी की तिथियों पर असमंजस रहता था, लेकिन इस बार चंद्रग्रहण के कारण स्थिति और भी उलझनभरी हो गई है। शहर सहित प्रदेशभर में लोग यह जानना चाह रहे हैं कि आखिर होलिका दहन और रंगों की होली किस दिन मनाई जाए।
ज्योतिषाचार्य डॉ. सुदीप सोनी (जैन) के अनुसार इस वर्ष होलिका दहन 2 मार्च को ही किया जाएगा, लेकिन यह दहन भद्रा पुच्छ काल में मध्यरात्रि बाद होगा। उन्होंने बताया कि 2 मार्च की शाम 5 बजकर 56 मिनट से 3 मार्च की सुबह 5 बजकर 32 मिनट तक भद्रा का प्रभाव रहेगा। शास्त्रों के अनुसार भद्रा के मुख काल में होलिका दहन वर्जित माना गया है, जबकि पुच्छ काल में दहन करना शुभ होता है। इसी कारण मध्यरात्रि बाद का समय श्रेष्ठ माना गया है।
डॉ. सोनी ने बताया कि 2 मार्च को प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा है, जो होलिका दहन के लिए मान्य तिथि मानी जाती है। पूर्णिमा तिथि 2 मार्च की शाम 5 बजकर 56 मिनट से 3 मार्च की शाम 5 बजकर 8 मिनट तक रहेगी। ऐसे में शास्त्रसम्मत नियमों के अनुसार 2 मार्च की मध्यरात्रि बाद, भद्रा पुच्छ काल में होलिका दहन किया जाएगा। उन्होंने बताया कि रात्रि 1 बजकर 26 मिनट से 2 बजकर 38 मिनट तक होलिका दहन का श्रेष्ठ मुहूर्त रहेगा। इसके अतिरिक्त 3 मार्च को सूर्योदय से पहले सुबह 5 बजकर 19 मिनट से 6 बजकर 55 मिनट तक भी दहन किया जा सकता है।
ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार 3 मार्च को चंद्रग्रहण भारत में स्पष्ट रूप से दिखाई देगा। ग्रहण दोपहर 3 बजकर 21 मिनट से प्रारंभ होकर शाम 6 बजकर 47 मिनट तक रहेगा। धार्मिक मान्यताओं में ग्रहण और सूतक काल को अशुभ माना गया है। इस अवधि में किसी भी प्रकार के शुभ कार्य, पूजा-अर्चना या मांगलिक गतिविधियों से परहेज करने की सलाह दी जाती है। इसी कारण 3 मार्च को रंग-गुलाल खेलने को शास्त्रसम्मत नहीं माना जा रहा है।
डॉ. सोनी का कहना है कि परंपरा के अनुसार होलिका दहन के बाद आने वाले सूर्योदय के दिन धुलेंडी मनाई जाती है। चूंकि इस बार 3 मार्च को ग्रहण का प्रभाव रहेगा, इसलिए ग्रहण समाप्ति के बाद शुद्धिकरण किया जाएगा और 4 मार्च को रंगों की होली खेलना अधिक उपयुक्त रहेगा। इस प्रकार इस वर्ष अधिकांश स्थानों पर 4 मार्च को धुलेंडी मनाने की संभावना है।
हालांकि शहर के कुछ मोहल्लों और समितियों ने अलग निर्णय भी लिए हैं। कुछ स्थानों पर 3 मार्च की रात्रि में होलिका दहन करने और 4 मार्च को धुलेंडी मनाने की घोषणा की गई है, ताकि ग्रहण और सूतक काल का प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो सके। प्रशासन की ओर से भी नागरिकों से अपील की गई है कि वे अपने-अपने क्षेत्र की परंपराओं और पंडितों के मार्गदर्शन के अनुसार पर्व मनाएं।
गौरतलब है कि होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक भी है। बदलती परिस्थितियों के बीच भी लोगों में उत्साह बना हुआ है। बाजारों में अबीर-गुलाल, पिचकारियों और मिठाइयों की खरीदारी शुरू हो चुकी है। लोग तिथियों को लेकर स्पष्टता चाहते हैं, ताकि वे परिवार और समाज के साथ हर्षोल्लास से पर्व मना सकें।
इस वर्ष ग्रहण के कारण तिथियों में थोड़ा फेरबदल अवश्य है, लेकिन श्रद्धा और उल्लास में कोई कमी नहीं है। शास्त्रसम्मत मुहूर्त में होलिका दहन कर 4 मार्च को रंगों की बौछार के साथ धुलेंडी मनाना ही अधिक उपयुक्त माना जा रहा है।
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